‘सिस्टम की सुस्ती’ ने उत्तराखंड को दिया ‘एक और झटका’ : संकट में सूबे की जैविक खेती
लीगल एंटिटी न होने के चलते 312 ऑर्गेनिक ग्रोवर ग्रुप से जुड़े राज्य के 90 हजार से ज्यादा किसानों के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट सस्पेंड
रुद्रपुर। उत्तराखंड का सुस्त और उदासीन सरकारी सिस्टम अपनी कार्यपाली के चलते राज्य की दशा दिशा बदलने वाली कई महत्वाकांक्षी योजनाओं को पलीता लगा चुका है। अब प्रदेश के सुस्त प्रशासनिक सिस्टम ने उत्तराखंड को देश में ऑर्गेनिक खेती के मानचित्र में मॉडल राज्य के तौर पर स्थापित करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को एक बार फिर तगड़ा झटका दिया है। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड को देश में ऑर्गेनिक खेती के क्षेत्र में मॉडल राज्य के रूप में स्थापित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा पिछले कई वर्षों से लगातार प्रयास किए जा रहे है और इसके लिए सरकार द्वारा एक महत्वपूर्ण योजना पर अमल किया जा रहा है मगर सिस्टम की लापरवाही उदासीनता एवं सुस्ती के चलते अब यह महत्वाकांक्षी योजना बड़े संकट में फंसती नजर आ रही है। ज्ञात हो कि प्रदेश में जैविक खेती से जुड़े 90 हजार से ज्यादा किसानों के ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट सस्पेंड होने से न सिर्फ किसानों की आजीविका प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है, बल्कि राज्य की ऑर्गेनिक पहचान पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।उत्तराखंड स्टेट ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी (यूएसओसीए) द्वारा की गई इस कार्रवाई ने विभागीय कार्यप्रणाली और सरकारी तैयारियों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य में फिलहाल करीब डेढ़ लाख किसान ऑर्गेनिक खेती से जुड़े हुए हैं, जो लगभग 74 हजार हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती कर रहे हैं। पिछले दो दशकों में किसानों को रासायनिक खेती से हटाकर जैविक खेती की ओर लाने के लिए सरकार ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए थे। किसानों को प्रशिक्षण, उत्पादों के प्रमाणीकरण और बाजार उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए। लेकिन अब सरकारी सिस्टम की धीमी कार्य प्रणाली और विभागीय समन्वय की कमी ने पूरी व्यवस्था को संकट में डाल दिया है। हासिल जानकारी के मुताबिक, प्रदेश के 312 ऑर्गेनिक ग्रोवर ग्रुप से जुड़े किसानों का प्रमाणीकरण इसलिए निलंबित किया गया क्योंकि, इन समूहों के पास वैध श्लीगल एंटिटीश् (कानूनी इकाई) का दर्जा नहीं था, जबकि नियमों के अनुसार, ऑर्गेनिक खेती से जुड़े समूहों का सोसाइटी, कंपनी या अन्य कानूनी संस्था के रूप में पंजीकृत होना जरूरी है। लेकिन सरकारी सिस्टम की सुस्ती एवं उदासीनता के चलते बड़ी संख्या में समूह अब तक रजिस्टर्ड नहीं हो सके। बताया जा रहा है कि एपीडा (एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 16 अप्रैल 2026 को कृषि सचिव एसएन पांडे को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत भी कराया था। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर किसानों और समूहों को समय रहते रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से जोड़ने के लिए ठोस पहल नहीं की गई। अब हालात यह हैं कि 90 हजार से ज्यादा किसानों के सर्टिफिकेट सस्पेंड हो चुके हैं और यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो जून के अंत तक 1 लाख 13 हजार से अधिक किसानों के प्रमाणीकरण पर भी संकट के बादल मंडरा सकते हैं। उत्तराखंड के किसानों को जैविक खेती की ओर मोड़ने की गरज से चलाई जा रही मुहिम पर मंडरा रहे संकट के बादलों को देखते हुए भारत सरकार के कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने भी गंभीर चिंता व्यक्त की है। एपीडा का मानना है कि उत्तराखंड देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है, जहां पिछले वर्षों ऑर्गेनिक खेती को बड़े स्तर पर बढ़ावा मिला है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में किसानों का प्रमाणीकरण निलंबित होना राज्य और किसानों दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।एपीडा ने राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि उत्तराखंड ऑर्गेनिक कमोडिटी बोर्ड (यूओसीबी) और यूएसओसीए को आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं, ताकि किसानों के प्रमाणीकरण का नवीनीकरण जल्द हो सके। राहत की बात यह है कि प्राधिकरण ने किसानों को आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय देने पर भी सहमति जताई है, फिर भी बड़ा सवाल यह है कि जब पहले ही चेतावनी मिल चुकी थी, तब समय रहते आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए गए ?
