एसआईआर का नोटिस मिलने के बाद मतदाताओं की बढ़ी टेंशन !
कोई भी दस्तावेज झूठा, मनगढ़ंत, गलत पाया जाता है तो बीएनएस और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कार्रवाई हो सकती है
देहरादून। उत्तराखंड के मतदाताओं के लिए एसआईआर की राह उतनी आसान नहीं है, जितनी कि राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा शुरुआती दौर में बताई जा रही थी। मतदाताओं के लिए एसआईआर के रास्ते से गुजर कर मतदान का अधिकार हासिल कर लेने का पथ कितना घुमावदार और पथरीला है? विशेष गहन पुनरीक्षण का प्रथम चरण संपन्न होने के बाद यह बात शीशे की तरह साफ होने लगी है। गौर तलब है कि विशेष गहन पुनरीक्षण संपन्न होने के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने ड्राफ्रट मतदाता सूची जारी करते समय स्पष्ट रूप से कहा था, कि जिन मतदाताओं के विवरण में विसंगतियां पाई गई है उन्हें आयोग की ओर से एक नोटिस जारी किया जाएगा। आयोग की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया था कि यह एक सामान्य सी कार्यवाही होगी तथा मतदाताओं को नोटिस से घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उल्लिखित विसंगतियों को दूर कर सभी मतदाता अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कर सकेंगे, लेकिन राज्य में चल रहे विशेष ग्रहण पुनरीक्षण का आरंभिक चरण समाप्त होने और ड्राफ्रट मतदाता सूची जारी होने के बाद यह स्पष्ट होने लगा है कि विशेष ग्रहण परीक्षण के मसले पर निर्वाचन आयोग के दांत खाने वाले अलग और दिखाने वाले अलग हैं। वह इसलिए क्योंकि, सहायक मुख्य निर्वाचन अधिकारी मस्तू दास ने बीते रोज स्पष्ट किया है कि मतदाताओं को भेजी गई नोटिस की सुनवाई के दौरान दिए गए बयानों के समर्थन में मतदाता जो भी दस्तावेज देंगे, उनकी आयोग स्वतंत्र रूप से जांच कराएगा। मसलन, किसी ने 10वीं का प्रमाणपत्र दिया है तो संबंधित बोर्ड से उसका सत्यापन कराया जाएगा। कोई भी दस्तावेज झूठा, मनगढ़ंत, गलत पाया जाता है तो बीएनएस और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कार्रवाई हो सकती है। सहायक निर्वाचन मुख्य निर्वाचन अधिकारी के उपरोक्त स्पष्टीकरण के बाद एसआईआर का नोटिस मिलने की कल्पना मात्र से ही मतदाताओं के हाथ पांव फूलने लगे हैं। विशेष कर उन मतदाताओं के जिनके नाम में स्पेलिंग और आयु से संबंधित गड़बड़ियां हैं। गौर तलब है कि किसी मतदाता सूची में मतदाता के नाम की स्पेलिंग कुछ और है और किसी मतदाता सूची में कुछ और। इसी तरह विभिन्न मतदाता सूची में मतदाताओं की आयु भी पृथक- पृथक है। यहां पर यह बताना आवश्यक है कि मतदाता सूची में उपरोक्त गड़बड़ियां लंबे समय से चली आ रही है और इसको निर्वाचन आयोग ने दुरुस्त करने की पहल अब से पहले कभी नहीं की। और सबसे अहम बात तो यह है कि उपरोक्त गड़बड़ियों के लिए मतदाता कहीं से भी उत्तरदाई नहीं है, क्योंकि मतदाता सूची तैयार करने तथा प्रिंट करने का काम निर्वाचन आयोग करता है। ऐसे में मतदाताओं को इन गड़बड़ियों के लिए उत्तरदाई ठहरना कहीं से भी न्याय संगत नहीं है। फिर भी, राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अब विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सामने आई विसंगतियों पर सख्त रुख अपनाते हुए प्रदेश के तकरीबन 19.04 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी कर निर्धारित तिथि पर दस्तावेजों के साथ उपस्थित होने को कहा जा रहा है। साथ ही आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेज पाए जाने पर संबंधित कानूनों के तहत जेल और जुर्माने की कार्रवाई की जा सकती है। कानून के जानकार बताते हैं कि झूठी जानकारी देने के आरोप में मतदाताओं के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता बीएनएस की धारा-217 के तहत कार्यवाई हो सकती है। ये धारा किसी लोक सेवक ;सरकारी अधिकारी या पुलिसद्ध को नुकसान पहुंचाने के इरादे से उसे जानबूझकर झूठी या गलत सूचना देने से संबंधित है। इस धारा के प्रावधानों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए कि सूचना झूठी है, किसी सरकारी अधिकारी को ऐसी जानकारी देता है, जिससे वह अधिकारी किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान या परेशानी पहुंचाए तो उसे एक साल की कैद, 10 हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकता है। इसके अलावा झूठी जानकारी देने वाले मतदाताओं के विरुद्ध लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा-31 के तहत भी कार्रवाई हो सकती है। यह धारा झूठी घोषणाएं करने से संबंधित है, जिसके तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए लिखित रूप में गलत जानकारी देना एक दंडनीय अपराध है।दोषी पाए जाने पर एक वर्ष तक का कारावास, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
