किच्छा पालिका चुनावः अब त्रिकोणीय होगा मुकाबला, भाजपा-कांग्रेस के सामने साख बचाने की परीक्षा
नाम वापसी के बाद अध्यक्ष पद पर तीन प्रमुख चेहरे आमने-सामने
किच्छा। करीब दो वर्ष नौ माह के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार किच्छा नगर पालिका परिषद के चुनाव का रास्ता साफ हो गया है। नामांकन और नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अध्यक्ष पद के चुनावी मैदान में भाजपा के संदीप अरोड़ा, कांग्रेस के राजेश प्रताप सिंह के अलावा निर्दलीय प्रत्याशी अब्दुल रशीद उर्फ जक्कू प्रमुख चेहरे के रूप में सामने हैं। वहीं निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भाजपा के बागी नरेंद्र टाकुली ने नामांकन पत्र वापिस तो नहीं लिया था लेकिन अब उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को अपना समर्थन दे दिया है। कागजों पर मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस नजर आ रहा है, लेकिन निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी ने चुनावी गणित को पूरी तरह बहुकोणीय बना दिया है। अब यह चुनाव केवल दो प्रमुख दलों के प्रत्याशियों की प्रतिष्ठा का मुकाबला नहीं रह गया है। टिकट वितरण से उपजा असंतोष, सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत जनाधार, वार्डवार स्थिति और निर्दलीय प्रत्याशियों की पकड़ परिणाम को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक बन सकते हैं। यही वजह है कि नाम वापसी के बाद भाजपा और कांग्रेस भले ही कुछ हद तक राहत महसूस कर रही हों, लेकिन दोनों दलों की असली परीक्षा अब शुरू हुई है। भाजपा के सामने टिकट से बड़ी चुनौती भीतर का असंतोषरू भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल टिकट वितरण के बाद पैदा हुए असंतोष को पूरी तरह खत्म करने का है। शैली फुटेला और लवी सहगल के नाम वापस लेने से पार्टी को निश्चित रूप से राहत मिली है, लेकिन यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि टिकट को लेकर उपजा असंतोष पूरी तरह समाप्त हो चुका है।नाम वापसी के दौरान पार्टी के प्रमुख नेताओं की सक्रियता और अलग-अलग खेमों की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चाएं होती रहीं। विधायक और पूर्व विधायक खेमों के बीच तालमेल, संगठन की सक्रियता और स्थानीय नेताओं की प्रत्याशी के पक्ष में एकजुटता अब चुनाव की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।भाजपा ने डैमेज कंट्रोल के लिए रुद्रपुर मेयर विकास शर्मा, जिलाध्यक्ष कमल जिंदल सहित संगठन के वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय किया है। पार्टी की कोशिश स्पष्ट है कि टिकट को लेकर नाराजगी को चुनावी नुकसान में बदलने से रोका जाए। हालांकि असली तस्वीर बूथ स्तर पर सामने आएगी। सवाल यही है कि नाम वापसी तक शांत दिखाई दे रहा असंतोष मतदान के दिन भी नियंत्रित रहेगा या भीतरघात का रूप लेगा। कांग्रेस को भी भीतर की चुनौतियों से पार पाना होगारू भाजपा के असंतोष को कांग्रेस अपने लिए राजनीतिक अवसर के रूप में देख रही है, लेकिन कांग्रेस के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। पार्टी ने जीवनचंद जोशी जैसे दावेदार को अपने प्रत्याशी के समर्थन में नाम वापस लेने के लिए तैयार किया। पूर्व पालिका अध्यक्ष दर्शन सिंह कोहली का पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में सक्रिय होना भी कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।इसके बावजूद टिकट वितरण को लेकर कुछ नेताओं और वार्ड स्तर पर कार्यकर्ताओं में असंतोष की चर्चाएं पार्टी के लिए चिंता का विषय हैं। सुनीता कश्यप की नाराजगी हो या विभिन्न वार्डों में चुनाव चिन्ह और टिकट को लेकर उठे सवाल, चुनाव के दौरान ये छोटे विवाद बड़े राजनीतिक नुकसान में बदल सकते हैं।कांग्रेस द्वारा वैश्य समाज से जुड़े प्रभावशाली परिवार के पक्ष में पार्टी सिंबल को लेकर लिया गया निर्णय भी चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी की कोशिश सामाजिक समीकरणों को साधने की है, लेकिन यह समीकरण मतदान के दिन कितने प्रभावी साबित होते हैं, इसका फैसला मतदाता ही करेगा। अब्दुल रशीद उर्फ जक्कू के मैदान में बने रहने से मुस्लिम मतों के संभावित विभाजन की चर्चा शुरू हो गई है। वहीं पर्वतीय समाज और व्यक्तिगत संपर्क वाले मतदाताओं के बीच समीकरण प्रभावित कर सकती है। हालांकि इन दोनों प्रत्याशियों का वास्तविक प्रभाव कितना होगा, यह मतदान और मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा। नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के साथ दोनों प्रमुख दलों ने शुरुआती डैमेज कंट्रोल का चरण पार कर लिया है। अब चुनावी रणनीति कागज से निकलकर बूथ और मतदाता तक पहुंचनी है। दोनों दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या टिकट से नाराज नेता वास्तव में पार्टी प्रत्याशी के लिए काम करेंगे? क्या उनके समर्थक भी पार्टी के साथ खड़े होंगे? क्या वार्ड स्तर पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर हो पाएगी? और क्या प्रत्याशी अपने व्यक्तिगत जनाधार के साथ पार्टी के संगठनात्मक वोट को जोड़ पाने में सफल होंगे?इन सवालों के जवाब ही चुनाव परिणाम की असली दिशा तय करेंगे।
नगर पालिका क्षेत्र में 52 हजार मतदाता, करीब 11 हजार मुस्लिम वोट
किच्छा। किच्छा नगर पालिका क्षेत्र में करीब 52 हजार मतदाता बताए जा रहे हैं। इनमें लगभग 11 हजार मुस्लिम मतदाताओं की संख्या बताई जाती है। सिरौलीकलां के अलग नगर पालिका बनने के बाद किच्छा के चुनावी समीकरण में भी बदलाव आया है। इसके अलावा पर्वतीय समाज, वैश्य समाज, बंगाली समाज सहित विभिन्न सामाजिक समूहों की मौजूदगी भी चुनाव परिणाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि किसी भी समुदाय के वोट को एकमुश्त किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में मान लेना राजनीतिक विश्लेषण की बड़ी भूल होगी। स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि, पारिवारिक और सामाजिक संबंध तथा वार्डवार समीकरण मतदान के रुख को प्रभावित कर सकते हैं।यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक के भरोसे चुनाव जीतने की रणनीति जोखिम भरी साबित हो सकती है। अध्यक्ष पद के लिए भाजपा के संदीप अरोड़ा, कांग्रेस के राजेश प्रताप सिंह, अब्दुल रशीद उर्फ जक्कू में हैं। तीन प्रमुख चेहरों के बीच होने वाला यह मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि यहां जीत केवल पार्टी के चुनाव चिन्ह से तय होती नजर नहीं आ रही। स्थानीय प्रभाव, व्यक्तिगत संपर्क, सामाजिक समीकरण, संगठन की ताकत, टिकट से उपजी नाराजगी और स्थानीय मुद्दे इन सभी का मिश्रण चुनाव परिणाम तय करेगा।भाजपा के सामने जहां अपने भीतर के असंतोष को मतदान तक नियंत्रित रखने की चुनौती है, वहीं कांग्रेस के सामने संगठन को एकजुट रखते हुए भाजपा विरोधी माहौल को वोट में बदलने की परीक्षा है। निर्दलीय प्रत्याशी इन दोनों दलों के समीकरण में कितनी सेंध लगाते हैं, यह चुनाव का सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। नाम वापसी के बाद चुनावी तस्वीर जरूर साफ हो गई है, लेकिन मुकाबला अभी भी पूरी तरह खुला है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि बागी और निर्दलीय प्रत्याशी कितने वोट अपने पक्ष में खींचते हैं, दोनों प्रमुख दल अपने नाराज खेमों को कितना साध पाते हैं और किच्छा का मतदाता आखिर अध्यक्ष की कुर्सी किसके हवाले करता है।
