उत्तराखंड में बेहतर हुई मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएं
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में दिखी ‘स्वस्थ उत्तराखंड’ की झलक, लेकिन स्तनपान एवं कुपोषण के क्षेत्र में चुनौतियां बरकरार
देहरादून। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट में स्वास्थ्य उत्तराखंड की झलक सामने आई है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं, संस्थागत प्रसव, टीकाकरण और गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य जांच जैसे संकेतकों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। जबकि, कुछ मामलों में अभी चुनौतीपूर्ण हालात बने हुए हैं। हालांकि, ज्यादातर मामलों में साल 2019-21 के आंकड़ों की तुलना में सुधारात्मक बदलाव देखा गया है। देखा जाए तो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ताजा आंकड़े उत्तराखंड के स्वास्थ्य क्षेत्र की मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़ों की तुलना से स्पष्ट है कि राज्य ने स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुदूर ग्रामीण क्षेत्र तक बढ़ाने में सफलता हासिल की है, लेकिन पोषण और बाल देखभाल के कुछ क्षेत्रों में अभी और प्रयासों की जरूरत है।उत्तराखंड में गर्भवती महिलाओं को समय पर स्वास्थ्य सेवाएं मिलने की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। सर्वेक्षण के अनुसार गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में प्रसवपूर्व जांच कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत 68.8 से बढ़कर 80.6 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह कम से कम चार बार प्रसवपूर्व जांच कराने वाली महिलाओं का अनुपात 61.8 प्रतिशत से बढ़कर 68.3 प्रतिशत पहुंच गया। साथ ही गर्भवती महिलाओं की ओर से आयरन-फोलिक एसिड 180 दिनों या उससे अधिक अवधि तक खुराक लेने का प्रतिशत 25 प्रतिशत से बढ़कर 25.4 प्रतिशत हुआ है। हालांकि, इसमें वृद्धि बहुत सीमित रही है। वहीं, 100 दिन या उससे अधिक समय तक आयरन- फोलिक एसिड सेवन करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 46।5 से घटकर 43.3 प्रतिशत हो गया है, जो चिंता का विषय माना जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार मां और बच्चे की सुरक्षा से जुड़े एमसीपी प्राप्त करने वाली पंजीकृत गर्भवतियों का प्रतिशत 97.1 से बढ़कर 98.6 प्रतिशत हो गया है, जो स्वास्थ्य तंत्र की बेहतर पहुंच को दर्शाता है। रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार राज्य में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत 83.2 से बढ़कर 88.9 प्रतिशत हो गया है। इसका सीधा मतलब है कि अब ज्यादा महिलाएं अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव करा रही हैं, जिससे मातृ एवं नवजात मृत्यु दर को कम करने में मदद मिल सकती है।इसके अलावा कुशल स्वास्थ्यकर्मियों की देखरेख में होने वाले प्रसवों का प्रतिशत भी 83.7 से बढ़कर 90.3 प्रतिशत पहुंच गया है। यह संकेतक ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ने का प्रमाण माना जा रहा है। हालांकि, संस्थागत प्रसव बढ़ने के साथ ही सीजेरियन डिलीवरी सिजेरियन सेक्शन के मामलों में भी तेजी आई है।राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -5 में कुल सीजेरियन प्रसव 20।4 प्रतिशत थे, जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 में बढ़कर 25.9 प्रतिशत हो गए हैं। निजी अस्पतालों में यह दर 43.3 प्रतिशत से बढ़कर 47.7 प्रतिशत हो गई है। जबकि, सरकारी संस्थानों में भी ये 14 प्रतिशत से बढ़कर 14.7 प्रतिशत पहुंच गई है। आंकड़ों के अनुसार प्रसव के बाद दो दिनों के भीतर स्वास्थ्यकर्मियों से जांच प्राप्त करने वाली माताओं का प्रतिशत 78 प्रतिशत से बढ़कर 86।5 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह जन्म के बाद दो दिनों के भीतर स्वास्थ्य जांच पाने वाले बच्चों का प्रतिशत 78.9 से बढ़कर 86.7 प्रतिशत हो गया है। यह संकेतक दर्शाता है कि राज्य में पोस्ट-नेटल केयर सेवाओं की उपलब्धता और उपयोग में सुधार हुआ है, जो नवजात मृत्यु दर कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है। बात टीकाकरण की करें तो टीकाकरण के क्षेत्र में उत्तराखंड ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। 12 से 23 माह आयु वर्ग के पूर्ण टीकाकृत बच्चों का प्रतिशत 81।1 से बढ़कर 86 प्रतिशत हो गया है। वैक्सीनेशन कार्ड के आधार पर पूर्ण टीकाकरण वाले बच्चों की संख्या भी 88.6 प्रतिशत से बढ़कर 90.8 प्रतिशत हो गई है। यह बताता है कि बच्चों के टीकाकरण रिकॉर्ड का रखरखाव भी बेहतर हुआ है। इसमें कई प्रमुख टीकों की कवरेज में वृद्धि दर्ज की गई है।आंकड़ों से संकेत मिलता है कि पोषण योजनाओं और आंगनबाड़ी सेवाओं का कुछ सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है। सबसे खास बात ये है कि अधिक वजन बच्चों का प्रतिशत 4.1 से घटकर केवल 0.7 प्रतिशत रह गया है। फिर भी राज्य में हर पांचवां बच्चा अवरुद्ध वृद्धि स्टंटिंग का शिकार है और लगभग उतने ही बच्चे कम वजन की श्रेणी में हैं। इसलिए कुपोषण पूरी तरह नियंत्रित नहीं माना जा सकता। ताजा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आलोक में प्रदेश के लिए एक चिंताजनक पहलू यह है कि राज्य में शिशु पोषण के कुछ महत्वपूर्ण संकेतकों में गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने का प्रतिशत 41.3 से घटकर 37.1 फीसदी रह गया है। इसके अलावा 6 महीने तक केवल मां का दूध पाने वाले बच्चों की फीसदी भी 52.5 से घटकर 40.8 फीसदी हो गया है। यह लगभग 12 फीसदी अंकों की बड़ी गिरावट है। हालांकि, 6 माह से कम आयु के बच्चों में वर्तमान स्तनपान की दर 90.2 फीसदी से मामूली घटकर 87।4 फीसदी रही है, लेकिन केवल स्तनपान के मामले में आई गिरावट राज्य के लिए चेतावनी संकेत है।
