‘पहाड़ की पीड़ा’ को ‘छू’ भी नहीं सका ‘कांग्रेस का मंच’
कांग्रेसियों के विमर्श से गायब रहे उत्तराखंड के ज्वलंत मुद्दे
हल्द्वानी। कांग्रेस पार्टी विगत रोज हल्द्वानी में शंखनाद रैली के माध्यम से विधानसभा चुनाव के बाद से चली आ रही अपनी राजनीतिक जड़ता को तोड़ने और कार्यकर्ताओं में एक नया जोश भरने में बेशक कामयाब रही हो, लेकिन कांग्रेस पार्टी के उसे मंच से, जिसमें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे मौजूद थे, पहाड़ की पीड़ा को दूर से भी नहीं छुआ गया। गौर तलब है कि कांग्रेस की शंखनाद रैली में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष समेत पार्टी के तमाम नेताओं ने ज्यादातर केंद्र और राज्य सरकार पर हमला बोलने और राष्ट्रीय फलक पर छा रहे देश और प्रदेश के अन्य तमाम मुद्दों को रेखांकित करने पर ही फोकस किया, लेकिन कांग्रेसियों के विमर्श से उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र के ज्वलंत मुद्दे मसलन, पहाड़ के गांवों से बढ़ता पलायन, मानव-वन्यजीव संघर्ष, जंगली जानवरों से फसल और जान-माल का नुकसान, बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं और राज्य की स्थायी राजधानी जैसे मुद्दे पूरी तरह गायब रहे। लिहाजा, कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर निराशा देखी गई कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने भी प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं ने मुख्य जमीनी समस्याओं को मंच से नहीं उठाया। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जहां अपने संबोधन में उन सभी मुद्दों को एक साथ पिरोया, जो सीधे युवा, किसान, महिला, सैनिक और गरीब परिवारों से जुड़े हैं। साथ ही उन्होंने राज्य को देवभूमि और वीरों की भूमि बताते हुए कुमाऊं और गढ़वाल रेजीमेंट का उल्लेख करते हुए उत्तराखंड में रोजगार, भर्ती, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सैनिक सम्मान और किसानों के मुद्दों को कांग्रेस के चुनावी एजेंडे से जोड़ने की कोशिश की। वहीं, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने अपने भाषण में पार्टी संगठन को मजबूत करने और आगामी चुनावों की तैयारी पर अच्छा खासा जोर दिया। इसके अलावा नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा उठाया तो भुवन कापड़ी, करन मेहरा और हरक सिंह जैसे दिग्गज कांग्रेसियों ने भी सरकार को घेरते हुए ही अपने अपने भाषण पूरे किए। जबकि होना तो यह चाहिए था की राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी में कांग्रेस के मंच से देश एवं प्रदेश के वर्तमान मुद्दों के साथ-साथ उत्तराखंड के मूल मुद्दों को भी बड़े ही जोर शोर से उठाया जाता ताकि पूरे प्रदेश में यह संदेश दिया जा सके कि कांग्रेस पार्टी को उत्तराखंड के हर क्षेत्र तथा हर वर्ग की चिंता है, मगर इसके उलट कांग्रेस नेतृत्व का फोकस सिर्फ सत्ता विरोध तक ही सीमित रहा ज्ञात हो कि रैली में राज्य के पहाड़ी अंचलों से भी बड़ी संख्या में कार्यकर्ता पहुंचे ऐसे में पहाड़ के गांवों से जुड़े लोगों को उम्मीद थी कि उनके दर्द को राष्ट्रीय स्तर पर आवाज मिलेगी पर उनके हाथ अंततः निराशा ही लगी। ऐसे में राजनीतिक हल्का में अब यह सवाल विमर्श आकार लेने लगा है कि पहाड़ की पीड़ा की ऐसी अनदेखी के चलते कांग्रेस सत्ता में वापसी कैसे कर पाएगी ?
