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‘मासूमों’ को भी नहीं ‘बक्श’ रहे ‘देवभूमि के दानव’ : उत्तराखंड में बाल अपराध की संख्या में बीस फीसदी का उछाल

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट ने बाल सुरक्षा तंत्र पर लगाए सवालिया निशान
देहरादून। देवभूमि के तौर पर प्रतिष्ठित उत्तराखंड में ऐसे दानवों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जो अपनी आपराधिक मनोवृत्ति के चलते मासूम बच्चों का शिकार करने से भी गुरेज नहीं करते ।यह देवभूमि में लगातार बढ़ रही दानवों की संख्या का ही नतीजा है कि राज्य की शांत वादियों में मासूमों पर ढाए जाने वाले जुल्म में लगातार इजाफा हो रहा है । नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के आंकड़ों की मानें ,तो बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में साल 2023-24 के मुकाबले साल 2024-25 में बीस फीसदी का उछाल आया है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के उपरोक्त आंकड़ों ने प्रदेश के बाल सुरक्षा तंत्र को एक तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया है। दरअसल, एनसीआरबी यानी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, उत्तराखंड में साल 2022 में बच्चों के विरुद्ध अपराध के 1,706 मामले दर्ज हुए थे, जो कि साल 2023 में मामूली बढ़कर 1,710 तक पहुंचे, लेकिन सासाल 2024 में यह संख्या तेजी से बढ़ कर 2,068 हो गई।आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में उत्तराखंड में बच्चों के खिलाफ अपराध की दर 54।4 फीसदी रही, जो राष्ट्रीय औसत की तुलना में चिंताजनक मानी जा रही है। यह दर प्रति 1 लाख बच्चों की आबादी पर आधारित है। जो राज्य में बच्चों की सुरक्षा की वर्तमान स्थिति को दर्शाती है। इसके साथ ही उपरोक्त अवधि में बच्चों के विरुद्ध किए गए आपराधिक कृत्य के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र दािखल करने की दर भी 56।1 फीसदी दर्ज की गई है। उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 में बच्चों के अपहरण की घटनाओं में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साल 2024 में उत्तराखंड में भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) के तहत 217, जबकि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएसएस) के तहत 270 मुकदमे दर्ज किए गए। इनमें 217 मामले ऐसे हैं, जिन्हें मिसिंग चिल्ड्रन डीम्ड एज किडनैप यानी गुमशुदा बच्चों को अपहरण मानते हुए दर्ज किया गया है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में प्रमुख रूप से यौन शोषण, अपहरण, बाल श्रम और उत्पीड़न के मामले शामिल हैं। हालांकि पुलिस ऐसे मामलों में कार्रवाई तो कर रही है, लेकिन केवल चार्जशीट दािखल करना पर्याप्त नहीं है। बल्कि, मामलों मे जल्द न्याय करना भी उतना ही जरूरी है।देखा जाए तो बच्चों की सुरक्षा केवल , सरकार या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। बल्कि, परिवारों और समाज को भी इस दिशा में गंभीरता से सोचने की जरूरत है। स्कूलों में काउंसलिंग, साइबर जागरूकता अभियान और परिवारों में बेहतर संवाद के जरिए ही बच्चों को सुरक्षित माहौल दिया जा सकता है समाज में संयुक्त परिवारों का टूटना, बच्चों को पर्याप्त समय न मिलना, सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल और नैतिक शिक्षा में लगातार हो रही गिरावट भी बच्चों को असुरक्षित बना रही है। साथ ही प्रदेश में आजकल राजनीतिक और सामाजिक स्वार्थों के लिए भी छोटे बच्चों का इस्तेमाल किया जाने लगा है, जो बेहद चिंताजनक है। हाल ही में प्रदेश स्तर पर सुिखर्यों में आए चंपावत गैंग रेप केस में निहित स्वार्थ के लिए नाबालिक का इस्तेमाल इसका ताजा उदाहरण है।

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