जीएमवीएन से गायब हुई ‘सांसद के किराया घोटाले’ की फाइल !
ऑफिस तो आवंटित कराया पर किराया देने को तैयार नहीं सांसद माननीय के रसूख और अजीबोगरीब तर्क के आगे गढ़वाल मंडल विकास निगम बेबस
देहरादून। उत्तराखंड के राज्यसभा सांसद नरेश बंसल ने गढ़वाल मंडल विकास निगम मुख्यालय के दूसरे फ्रलोर पर ऑफिस तो आवंटित करा लिया, मगर जीएमवीएन को ऑफिस का किराया देने को कतई राजी नहीं है। किराया न देने के पीछे माननीय के तर्क भी बेहद अजीबो गरीब हैं। खास बात तो यह है कि राज्यसभा सांसद बंसल के अजीबोगरीब तर्क और सियासी रसूख के आगे गढ़वाल मंडल विकास निगम पूरी तरह लाचार है। दरअसल, उत्तराखंड में बीजेपी के राज्यसभा सांसद नरेश बंसल ने साल 2023 में देहरादून में स्थित जीएमवीएन मुख्यालय में सेवा केंद्र के नाम से एक दफ्रतर किराए पर लिया था। इस दफ्रतर का पिछला किराया करीब 03 लाख 51 रुपए प्रतिमाह था, जो एसईबीआई द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा था। अनुबंध समाप्त होने के बाद एसईबीआई ने यह स्थान खाली कर दिया था।इसके बाद इसी जगह में से 117-76 वर्गमीटर क्षेत्रफल का खाली स्थान 37,966 रुपए प्रतिमाह की दर से राज्यसभा सांसद नरेश बंसल को ऑफिस के लिए आवंटित कर दिया गया था। ऑफिस के लिए स्पेस आवंटित करते समय एक एग्रीमेंट भी निष्पादित किया गया था, जिसमें लिखा गया था कि उपरोक्त मासिक दर के अनुसार किराया जीएमवीएन मुख्यालय में जमा कराना होगा। यह दफ्रतर करीब ढाई साल से राज्यसभा सांसद नरेश बंसल के नाम पर आवंटित है, लेकिन आज तक सांसद की तरफ से जीएमवीएन को कोई किराया नहीं दिया गया। मजे की बात तो ये है कि राज्यसभा सांसद नरेश बंसल इस दफ्रतर का इस्तेमाल भी नहीं कर रहे हैं तथा जीएमवीएन भी इस मामले में उदासीन बना हुआ है और उसके स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई ही नहीं की जा रही। यानी न तो दफ्रतर का किराया लिया जा रहा है और न ही उसे खाली कराया जा रहा है, ताकि किसी और दिया जा सके। इस तरह देखा जाए तो जो निगम जबरदस्त घाटे से गुजर रहा है, उसे किराए के जरिए मिलने वाला पैसा भी नहीं मिल पा रहा। जहां तक सांसद के किराया न देने का सवाल है? तो ऑफिस का किराया न देने के पीछे उनके तर्क भी बेहद दिलचस्प हैं। उनके अनुसार उन्हें उपरोक्त दफ्रतर सांसद सेवा केंद्र के रूप में मिला है, लेकिन गढ़वाल मंडल विकास निगम ने इस दफ्रतर को ठीक ही नहीं करवाया। इसलिए इसे बंद रखा गया है। लिहाजा किसी भी तरह का किराया देने का औचित्य ही नहीं है । उनका यह भी तर्क है कि वह इस कार्यालय में कोई व्यापार नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा जीएमवीएन द्वारा उन्हें किसी तरह का कोई भी पत्र किराए को लेकर नहीं भेजा गया है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यह है कि अगर राज्यसभा सांसद नरेश बंसल सही कह रहे हैं ,तो फिर आखिरकार गढ़वाल मंडल विकास निगम ने इस भवन के लिए किराए को लेकर कोई पत्र राज्यसभा सांसद को क्यों नहीं लिखा? कहीं ऐसा तो नहीं की गढ़वाल मंडल विकास निगम के शीर्ष अधिकारी ही किराया वसूलने को लेकर पूरी तरह उदासीन हो अथवा माननीय के राजनीतिक रसूख से खौफ खा रहे हो? मजे की बात तो यह है कि यह मामला उत्तराखंड सूचना आयोग भी पहुंच गया है। बीती 8 जुलाई को हुई सुनवाई में आयोग ने भी डॉक्यूमेंट का न मिलना विस्मयकारी बताया और लोक सूचना अधिकारी को निर्देशित किया कि डॉक्यूमेंट्स को गंभीरता से खोजा जाए। ऐसा न होने पर नियमानुसार कार्यवाही किए जाने की चेतावनी भी दी गई है। हैरानी की बात है कि गढ़वाल मंडल विकास निगम में पिछले लंबे समय से एक फाइल गायब है, लेकिन गायब फाइल को लेकर अब न तो कोई एफआईआर दर्ज कराई गई है, न ही इस पर कोई ठोस कार्रवाई की गई। इतना ही नहीं, राज्यसभा सांसद को यह कार्यालय देते वक्त देहरादून जिलाधिकारी कार्यालय से इसके किराए का निर्धारण कराए जाने की प्रक्रिया को अमल में लाया गया था। खबर है कि किराया निर्धारण के लिए अपनाई गई प्रक्रिया से संबंधित फाइल भी देहरादून जिला अधिकारी कार्यालय से लापता है । ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि दो-दो सरकारी कार्यालयों से इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज किसके इशारे पर गायब कर दिए गए ?
