August 30, 2026

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आखिर दिल्ली में कौन रच रहा है साजिश? बार-बार उछाली जा रही सत्ता परिवर्तन की अफवाहें

उत्तराखंड की सत्ता पर निगाह, मुख्यमंत्री बनने की चाह में दिल्ली चल रहा सियासी जोड़-तोड़
देहरादून। उत्तराखंड की शांत पहाड़ियों के बीच इन दिनों राजनीति में हलचल असामान्य रूप से तेज है। सरकार स्थिर है, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी काम कर रहे हैं, फिर भी बार-बार सत्ता परिवर्तन की अफवाहें उछाली जा रही हैं। सवाल स्वाभाविक है-जब राज्य में कोई राजनीतिक संकट नहीं, तो अस्थिरता का शोर क्यों? और इससे बड़ा सवाल यह कि आिखर दिल्ली में बैठकर कौन उत्तराखंड की राजनीति की बिसात बिछा रहा है? सूत्रें के मुताबिक, यह सब अचानक नहीं हो रहा। यह एक सुनियोजित प्रयास है, जिसमें कभी सोशल मीडिया को हथियार बनाया जाता है, तो कभी भाजपा के भीतर के कुछ असंतुष्ट चेहरों को आगे किया जाता है। थोड़े-थोड़े अंतराल पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को हटाने, नया चेहरा लाने और नेतृत्व परिवर्तन जैसे जुमले उछाले जाते हैं, ताकि भ्रम का माहौल बने और सरकार को अंदर से कमजोर दिखाया जा सके। राज्य के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि दिल्ली में बैठे कुछ जनप्रतिनिधि उत्तराखंड की कुर्सी पर अपनी निगाहें टिकाए हुए हैं। उनकी महत्वाकांक्षा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सत्ता केंद्रित है। इन्हीं महत्वा कांक्षाओं के चलते प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को जानबूझकर हवा दी जा रही है। कुछ जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार के खिलाफ बयानबाजी करवाई जा रही है, ताकि यह संदेश जाए कि पार्टी के भीतर ही सब कुछ ठीक नहीं है। इस साजिश की परतें यहीं खत्म नहीं होतीं। सूत्र बताते हैं कि इसके लिए बाकायदा फंड की व्यवस्था भी की जा रही है। फंड देने वालों में खनन माफिया और जमीन के बड़े कारोबारी शामिल हो सकते हैं-वे लोग जिनके हित मौजूदा सरकार की सख्ती से प्रभावित हुए हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा, दूसरी तरफ कारोबार पर लगी बंदिशों से छुटकारा पाने की चाह- यहीं से यह गठजोड़ जन्म लेता है।लेकिन शायद साजिशकर्ता यह भूल गए हैं कि उत्तराखंड का नेतृत्व किसी नौििसखए के हाथ में नहीं है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी युवा जरूर हैं, लेकिन राजनीति की बारीकियों को समझने में पूरी तरह सक्षम हैं। जानकारों की मानें तो धामी इस चक्रव्यूह को बनने से पहले ही पहचान चुके हैं और उसे तोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। उनकी कार्यशैली और निर्णयों ने यह साफ कर दिया है कि वे दबाव की राजनीति से संचालित होने वाले नेता नहीं हैं।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कई मौकों पर मुख्यमंत्री धामी की सार्वजनिक सराहना और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का उत्तराखंड दौरा, इन तमाम अटकलों पर विराम लगाने वाला संदेश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शाह का दौरा सिर्फ कार्यक्रम भर नहीं था, बल्कि उन सभी चेहरों के लिए संकेत था,जो दिल्ली में बैठकर उत्तराखंड की राजनीति को अस्थिर करने का सपना देख रहे हैं। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदलने की चर्चाएं फिलहाल राजनीतिक अफवाहों, निजी महत्वाकांक्षाओं और आर्थिक स्वार्थों का मिश्रण अधिक लगती हैं। जमीनी सच्चाई यह है कि सरकार स्थिर है, नेतृत्व स्पष्ट है और केंद्र का भरोसा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ खड़ा है। ऐसे में दिल्ली में रची जा रही साजिशें चाहे जितनी भी परिपक्व क्यों न दिखें, पहाड़ की राजनीति उन्हें आसानी से स्वीकार करने के मूड में नहीं दिखती। यही कारण है कि आज सवाल केवल इतना नहीं है कि फ्दिल्ली में कौन साजिश रच रहा है?य्असल सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड अब ऐसी साजिशों का मैदान बनेगा, या राजनीतिक परिपक्वता उन्हें शुरू होने से पहले ही खत्म कर देगी?

2022 की कहानी,जो सबक बन गई
राजनीतिक स्मृति को टटोलें तो पिछला 2022 का विधानसभा चुनाव आज भी कई सवाल छोड़ जाता है। उस चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पूरी ताकत झोंककर भाजपा को प्रदेश में जीत दिलाई। वहीं, पार्टी के भीतर ही कुछ ऐसे चेहरे थे, जिन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ में उन्हें चुनावी तौर पर हराने में भूमिका निभाई। वे अपने प्रयास में सफल तो हुए, लेकिन सत्ता की सीढ़ी नहीं चढ़ पाए। विडंबना यह रही कि चुनाव हारने के बावजूद धामी मुख्यमंत्री बनेऔर यहीं से कई महत्वाकांक्षाओं पर विराम लग गया।

2027 से पहले फिर वही बेचौनी
अब 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक आता दिख रहा है। सत्ता की भूख एक बार फिर करवट ले रही है। वही चेहरे, वही कोशिशें और वही रणनीति-सरकार के खिलाफ माहौल बनाओ, नेतृत्व पर सवाल खड़े करो और दिल्ली में दावेदारी मजबूत करो। लेकिन इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं।

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