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चुनावी बहिष्कार! कोली का किला कैसे भेदेगी भाजपा?

रूद्रपुर 27 अक्टूबर। नगर निगम रूद्रपुर की पूर्व मेयर के पति सुरेश कोली भाजपा के खिलाफ खुलकर मैदार में उतर आये है। मेयर पद के लिये निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उनका नामांकन खारिज हो चुका है। बताया जा रहा है कि नामांकन पर आपत्ति के खिलाफ कोली ने अब हाईकोर्ट की शरण में भी दस्तक दे दी है। मेयर पद के लिये टिकट कटने के बाद से ही नाराज चल रहे भाजपा के बागी नेता को मनाने के लिये भाजपा हाईकमान जहां सख्त तेवर अपनाये हुए है तो वहीं गत दिवस आपत्ति के दौरान सुनवाई के बाद जिस प्रकार उनके नामांकन को खारिज करवाने में भाजपा के नेता ने हाईप्रोफाईल वकीलों को लगवाकर उन्हें हर हाल में चुनाव से बाहर करने की भरसक कोशिश की। नतीजतन आपत्ति पर सुनवाई के बाद तथाकथित नजूल पर कब्जेदार होने पर कोली का पर्चा भी खारिज हो गया है। इध्र पूर्व मेयर सोनी कोली के पति एवं भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारी ने भाजपा पर कई बड़े आरोप भी लगा दिये है। उनका सापफ कहना है कि वह अभी बगावत से पीछे हटने को तैयार नहीं है। माना जा रहा है कि अब सुरेश कोली अगर अब भी अपने कदम पीछे नहीं खींचते है तो पार्टी के मेयर प्रत्याशी के खिलाफ माहौल बनाने के लिये वह कांग्रेस को समर्थन दे सकते है। अगर ऐसा हुआ तो भाजपा को इस बार दोबारा अपना मेयर स्थापित करने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है। इसके बावजूद जिस प्रकार सुरेश कोली को हर हाल में मनाने के लिये भाजपा ने उन्हें दर्ज राज्य मंत्राी बनाने तक का आॅफर भी दे दिया मगर इसके बावजूद उन्हें नहीं मना पा रही है। वहीं निकाय चुनाव में जीत हासिल करने के लिये अपने बागी नेता कोली की सियासी किलेबंदी करने में भाजपा अब तक नाकाम रही है। कोली से आपसी लड़ाई में कहीं भाजपा अपने मेयर का प्रचार करने में कांग्रेस से पीछे न रह जाये। दूसरी तरपफ भाजपा के बागी नेता सुरेश कोली क्षेत्रा की सियासत का केंद्र बन चुके हैं। नांमाकन खारिज होने के बावजूद अब भी सुरेश कोली भाजपा और कांग्रेस की जीत और हार के समीकरण में अहम रोल साबित कर सकते है। वैसे अब तक जहां वह कांग्रेस से टिकट हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाये वहीं भाजपा से टिकट कटने और पफर पूरी ताकत के साथ नामांकन खारिज कराने में जुटे भाजपा नेताओं से रोषित कोली ने बकायदा बड़े आॅफर को भी ठुकरा दिया है। अब कोली के अगले कदम पर कांग्रेस ने भी नजरें टिका दी हैं। माना जा रहा है कि जल्द ही कांग्रेस कोली से सम्पर्क साध् सकती है। रूद्रपुर नगर निगम में हांलाकि भाजपा का भारी वर्चस्व है लेकिन इस चुनाव में अपने ही पदाधिकारी की बगावत से भाजपा मुश्किल में दिख रही है। भाले ही अभी तक सुरेश कोली ने भाजपा से इस्तीपफा नहीं दिया हो मगर उनके तेवरों को भांपते हुए कांग्रेस ने कोली के वोटबैंक को अपने पाले में खिसकाने के लिये उन पर डोरे डालने शुरू कर दिये है। बहरहाल अब यह देखना भी दिलचस्प होगा कि कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों से टिकट हासिल करने में नाकाम सुरेश कोली अब किस दल का साथ देते है।
फिर गरमाया नजूल का मुद्दा..मालिकाना हक नहीं मिलने से आक्रोश
रूद्रपुर। निकाय चुनाव के बीच नजूल भूमि पर बसे हजारों लोगों को मालिकाना हक नहीं मिलने से वोटरों में भी आका्रेश दिखने लगा है। यहां रविंद्र नगर समेत नगर के विभिनन वार्ड़ों में कुछ लोगों द्वारा चुनाव बहिष्कार करने का आह्वान करते हुए बैनर टांग दिये गये है। इस बैनर में लिखा है कि हम नजूल पर रहने वालों से वोट मांगकर शर्मिंदा नहीं करें ,नेता ध्यान दें। इतना ही नहीं बैनर में पीले पंजे का चित्रा भी है जो भवनों को तोड़ हुए दिखाया गया है। इसमें लिखा गया है कि वोट दिया तो ऐसा ही हाल हो जायेगा। वहीं नगर निगम क्षेत्रा के कई वार्डों के साथ ही मुख्य बाजार एवं इंदिरा कालोनी आदि क्षेत्रों में ं इस प्रकार के कई बैनर लगाये गये है। गौर हो कि निकाय चुनाव में नजूल भूमि पर मालिकाना हक दिलाने की मांग को लेकर क्षेत्राीय नेताओं ने खुलकार मांग उठानी शुरू कर दी है। कई निर्दलीय प्रत्याशी भी नजूल पर मालिकाना हक दिलाने की मांग कर रहे है। वहीं कई वार्डो में चुनाव बहिष्कार के बैनर लगने से भाजपा में हड़कंप मचा हुआ है। जबकि कांग्रेस भी इस मुद्दे को लेकर भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने में जुटी हुई है। हांलाकि राज्य गठन के बाद अब तक नजूल भूमि पर बसे लोगों को कोई भी सरकारें मालिकाना हक दिलाने में नाकाम साबित हुई हैं मगर इस बार यह मुद्दा पिछले विधासभा चुनाव की तरह गरमा गया है। यहां भाजपा को अपने ही नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कुछ पूर्व पार्षदों ने संगठन बनाकर मोर्चा खोल दिया है तो पूर्व मेयर रह चुकी सोनी कोली के पति सुरेश कोली भी मालिकाना हक दिलाने के लिये संघर्ष करने की बात कहते नहीं थक रहे। अब देखना दिलचस्प होगा कि सत्तासीन भाजपा इस मुद्दे को लेकर लागों में विश्वास जगा पाती है या नहीं। अगर सत्तासीन भाजपा इतने विरोध के बावजूद जीत हासिल करती है तो नजूलवासियों की उम्मीदे फिर जाग सकती है। जबकि कांग्रेस के लिये यह चुनाव अपनी बची कुची साख बचाने और मेयर की सीट अपनी झोली में डालने के लिये जनता में कितनी सहानुभूता बटोर पाती है यह तो आगमी 20 नवम्बर को मतगणना के बाद ही पता चल पाये।

 (Narda) @ Uttaranchal Darpan.in

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