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सख्त नियमों के चक्रव्यूह में फंसे उत्तराखंड के मदरसे

देहरादून । मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड को समाप्त कर उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन और नए शैक्षिक सत्र से उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेने की अनिवार्य शर्त के बाद राज्य में मदरसा शिक्षा व्यवस्था के भविष्य पर गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। देवभूमि में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि अब राज्य में मदरसे लगभग खत्म होने की कगार पर हैं क्योंकि शायद ही कोई मदरसा प्रबंध समिति उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के तय मानकों और नियमों को पूरा कर पाएगी। धामी कैबिनेट ने कक्षा 8 तक के लिए मान्यता का अधिकार जिला विद्यालय समिति को सौंपा है जबकि इंटरमीडिएट तक की मान्यता के लिए राज्य स्तरीय शिक्षा बोर्ड में आवेदन करना होगा। सबसे बड़ा सवाल उन मदरसों के लिए खड़ा हो गया है जो वर्तमान में मस्जिदों या छोटे-छोटे कमरों के निजी भवनों में संचालित हो रहे हैं क्योंकि आवेदन से पूर्व उन्हें वे सभी कठिन दस्तावेज और बुनियादी सुविधाएं जुटानी होंगी जो सरकारी नियमानुसार किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए अनिवार्य हैं।वर्तमान में उत्तराखंड मदरसा बोर्ड में कुल 452 मदरसे पंजीकृत हैं जिनकी मान्यता आगामी 30 जून को समाप्त हो रही है। सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड को ही खत्म कर दिए जाने के बाद अब इन संस्थानों को 1 जुलाई से अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से संबद्धता लेनी होगी। आंकड़ों के अनुसार राज्य में 192 मदरसे केंद्र और राज्य सरकार से सहायता प्राप्त थे जबकि वक्फ बोर्ड द्वारा 117 मदरसे पंजीकृत किए गए थे जिनमें लगभग 46 हजार बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। गौरतलब है कि धामी सरकार द्वारा कराए गए पूर्व सर्वेक्षण में राज्य में 950 मदरसे चिन्हित हुए थे जिनमें से तकरीबन 300 मदरसे बिना अनुमति के चलते पाए गए जिन पर सरकार ने पहले ही ताला जड़ दिया था। सर्वेक्षण के दौरान यह तथ्य भी प्रकाश में आया था कि बिहार, असम, यूपी और झारखंड जैसे राज्यों से मुस्लिम बच्चे लाकर यहां पढ़ाया जा रहा था और उनकी पहचान छुपाने के लिए फर्जी आधार कार्ड तक बनाए गए थे जिसका संज्ञान बाल संरक्षण आयोग ने भी लिया था।धामी सरकार ने अब मदरसों में केवल पारंपरिक दीनी शिक्षा को रोककर उसके स्थान पर उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत निर्धारित एनसीईआरटी पाठड्ढक्रम लागू करने का निर्णय लिया है। देश में पहली बार उत्तराखंड में लागू किए गए अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के माध्यम से अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को भी सरकारी सहायता के दायरे में लाया गया है जो अब तक केवल एक विशेष समुदाय तक सीमित थी। अब मदरसा संचालकों के सामने सबसे बड़ी परेशानी जमीन की उपलब्धता और जरूरी कागजातों को लेकर है क्योंकि नियमानुसार शहरी क्षेत्र में कम से कम 2000 वर्ग मीटर और ग्रामीण क्षेत्रों में 1 एकड़ भूमि का होना अनिवार्य है। अधिकांश मदरसों के पास न तो पर्याप्त भूमि है और न ही खेल का मैदान या मानकों के अनुरूप कमरे। इसके साथ ही संस्थानों के पास बीएड और टीईटी उत्तीर्ण शिक्षकों का भी अभाव है।नए नियमों के तहत अब मदरसा संचालकों को अपने बैंक खातों का विवरण, चंदा उगाही और आर्थिक स्रोतों का भी ऑडिट करवाना होगा। सरकार को ऐसी जानकारियां मिली थीं कि कुछ मदरसा संचालक स्थानीय और खाड़ी देशों से मिलने वाली आर्थिक सहायता का उपयोग बच्चों की शिक्षा के बजाय अपने व्यक्तिगत ऐशो आराम पर कर रहे थे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का स्पष्ट कहना है कि उत्तराखंड में अवैध मदरसे बंद कर दिए गए हैं और अब अल्पसंख्यक समाज के बच्चों को राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली से जोड़ने के लिए उन्हें हर हाल में उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी और जो संस्थान ऐसा नहीं करेंगे उन्हें बंद कर दिया जाएगा।अल्पसंख्यक विभाग के विशेष सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा का अधिकार सबके लिए समान है और सरकार का प्रयास हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है। उन्होंने बताया कि सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड की मान्यता लेनी होगी और यदि वे धार्मिक शिक्षा देना चाहते हैं तो उसका पाठड्ढक्रम प्राधिकरण की शिक्षा समिति ही तय करेगी। मानकों का अनुपालन सबके लिए बराबर होगा हालांकि सरकार इन संस्थानों के विकास, प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों के लिए सहयोग देने को तैयार है। अब प्राथमिक स्कूल के लिए 10 हजार और उच्च प्राथमिक के लिए 15 हजार आवेदन शुल्क के साथ साथ लाखों की बैंक गारंटी भी जमा करानी होगी। मानकों में किसी भी प्रकार की कमी या बिना मान्यता के स्कूल चलाने पर संस्थान की मान्यता रद्द कर उसे अवैध घोषित कर दिया जाएगा।

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