मतदाता पंजीकरण फॉर्म 6 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी : कहा- बदलाव किसने किया, संशोधित प्रारूप को अदालत ने नहीं दी मंजूरी
नई दिल्ली। मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म 6 में किए गए कथित बदलाव को लेकर चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने साफ किया कि निर्वाचन आयोग द्वारा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म 6 के किसी संशोधित प्रारूप को उसकी ओर से मंजूरी नहीं दी गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अदालत संबंधित रिकॉर्ड देखना चाहती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि फॉर्म 6 में बदलाव किस स्तर पर और किसके द्वारा किया गया। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत ने संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है और रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्थिति की पूरी तस्वीर साफ होगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “रिपोर्ट सही हो सकती है या गलत, लेकिन हम उसके आधार पर आदेश पारित नहीं कर सकते। हमें उनके जवाब का इंतजार करना होगा।” यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब 2025 में फॉर्म 6 के साथ जोड़े गए एक अतिरिक्त घोषणा पत्र को लेकर निर्वाचन आयोग और अन्य पक्षों के बीच विवाद चल रहा है। निर्वाचन आयोग ने 28 सितंबर को जारी अपने बयान में दावा किया था कि फॉर्म 6 के साथ जोड़ी गई घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग पर भी राहत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अंतरिम तौर पर निलंबित करने की मांग को भी स्वीकार नहीं किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति के बिना कुछ फैसले लिए। इस पर पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग का जवाब आने तक अदालत उसके फैसलों को कानून के अनुरूप मानकर चलेगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि किसी रिपोर्ट की सत्यता की पुष्टि किए बिना उसके आधार पर आदेश जारी नहीं किया जा सकता। अदालत ने निर्वाचन आयोग का पक्ष सामने आने का इंतजार करने की बात कही।
फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा को लेकर विवाद
मामले का मुख्य केंद्र ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया में जोड़ी गई अतिरिक्त घोषणा है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान नए मतदाताओं से ऐसी जानकारी मांगी गई, जिसके जरिए उन्हें खुद को या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी को पिछली मतदाता सूची से जोड़ना था। इस व्यवस्था को लेकर तब विवाद गहराया, जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की आपत्तियों का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों अधिकारियों ने इस अतिरिक्त आवश्यकता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि फॉर्म 6, निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित वैधानिक फॉर्म है। ऐसे में नियमों में औपचारिक संशोधन के बिना उसमें प्रभावी बदलाव किए जाने पर सवाल उठता है।
जून 2025 के SIR आदेश से जुड़ा मामला
विवाद की पृष्ठभूमि निर्वाचन आयोग के जून 2025 में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण संबंधी आदेश से जुड़ी है। इसमें नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 के साथ ‘अनुबंध डी’ के रूप में एक अतिरिक्त घोषणा का प्रावधान किया गया था। हालांकि, जिस अतिरिक्त जानकारी को लेकर मौजूदा विवाद खड़ा हुआ, वह बाद में ऑनलाइन फॉर्म 6 की प्रक्रिया में दिखाई दी।जुलाई 2026 में शुरू की गई इस ऑनलाइन व्यवस्था में आवेदकों से खुद को अथवा अपने माता-पिता या दादा-दादी को पिछली SIR मतदाता सूचियों से जोड़ने संबंधी जानकारी मांगी गई। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के 27 मई को बिहार में SIR से संबंधित फैसले के कुछ सप्ताह बाद शुरू हुई थी।
निर्वाचन आयोग ने बदलाव से किया इनकार
निर्वाचन आयोग का कहना है कि फॉर्म 6 में कोई संशोधन नहीं किया गया था। आयोग के अनुसार, SIR के लिए जो घोषणा जोड़ी गई थी, वह फॉर्म में बदलाव नहीं बल्कि एक अतिरिक्त आवश्यकता थी।28 सितंबर को जारी बयान में आयोग ने कहा था कि उक्त घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म SIR से अलग अवधि में भी लागू रहेंगे।आयोग के मुताबिक, जिन राज्यों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां फॉर्म 6 से संबंधित अतिरिक्त SIR घोषणा को हटा दिया गया है। अब मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निर्वाचन आयोग का जवाब आने के बाद यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा की व्यवस्था किस प्रक्रिया के तहत लागू की गई थी।


