सुप्रीम कोर्ट में बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण केस पर 9 सितंबर को होगी सुनवाई
केंद्र और धामी सरकार ने तेज की कानूनी तैयारियां, गृह विभाग ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने के दिए निर्देश
देहरादून (उद संवाददाता)। हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में आगामी 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। मामला मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए तीसरे नंबर पर सूचीबद्ध है। ऐसे में इस दिन मामले में फैसला आने की संभावना जताई जा रही है। हल्द्वानी के बनभूलपुरा में रेलवे भूमि अतिक्रमण मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, जहाँ रेलवे की लगभग 29-31 एकड़ जमीन पर करीब 4,365 परिवारों और लगभग 50,000 लोगों के कब्जे का विवाद है। पिछले करीब दो माह से मामले की सुनवाई के लिए तिथियां निर्धारित होती रही हैं, लेकिन सूची में मुकदमे का क्रम 15 के बाद होने के कारण सुनवाई नहीं हो पा रही थी। अब रेलवे और उत्तराखंड सरकार की ओर से मामले को शीघ्र सुने जाने का अनुरोध किए जाने के बाद इसे प्राथमिकता क्रम में रखा गया है। जानकारी के मुताबिक रेलवे और उत्तराखंड सरकार के अधिवक्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष मामले की शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया गया था। इसके बाद 9 सितंबर को सुनवाई होने की स्थिति बनी है। मामले में लंबे समय से कानूनी प्रक्रिया चल रही है और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के बाद प्रभावित परिवारों के पुनर्वास सहित कई बिंदुओं पर राज्य सरकार, केंद्र और रेलवे को अपना पक्ष रखना पड़ा है। बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि पर कथित अतिक्रमण की जद में बड़ी संख्या में परिवार हैं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए गृह विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दिन हल्द्वानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखने के निर्देश जिला प्रशासन और पुलिस को दिए हैं। प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने के साथ ही किसी भी स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक तैयारियां रखने को कहा गया है। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से भी शासन स्तर पर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करने के लिए पूर्व में दिशा निर्देश दिए गए थे। सरकार की ओर से मामले से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं को मजबूती से रखने की तैयारी की जा रही है। वर्षों से अदालतों में चल रहा है भूमि विवादः बनभूलपुरा और गफूरबस्ती क्षेत्र में रेलवे भूमि पर अतिक्रमण का मामला पिछले कई वर्षों से अलग अलग अदालतों में उठता रहा है। इस विवाद में एक ओर रेलवे और राज्य सरकार का पक्ष है कि संबंधित भूमि रेलवे की है और उस पर किया गया कब्जा अवैध है, जबकि दूसरी ओर प्रभावित परिवारों की ओर से लंबे समय से वहां रहने, नगर निकाय के अभिलेखों में नाम दर्ज होने और कर आदि का भुगतान किए जाने जैसे तर्क दिए जाते रहे हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह दलील भी दी गई कि कई परिवार दशकों से संबंधित भूमि पर रह रहे हैं। कुछ परिवारों ने आजादी से पहले से वहां रहने का दावा किया है। उनके अनुसार स्थानीय प्रशासन और नगर निकाय के अभिलेखों में उनके मकान दर्ज हैं तथा लंबे समय से कर और अन्य शुल्क का भुगतान किया जाता रहा है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि क्षेत्र में वर्षों से मकान, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और अन्य सामाजिक सुविधाएं मौजूद हैं। इसलिए अचानक बेदखली की कार्रवाई करने के बजाय प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था पहले की जानी चाहिए। 2023 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मामला: जनवरी 2023 में नैनीताल हाईकोर्ट की ओर से रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने के आदेश के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। अदालत के समक्ष यह मुद्दा प्रमुखता से उठा था कि हजारों लोगों को तत्काल बेघर करने की स्थिति उत्पन्न न हो और मामले में मानवीय तथा पुनर्वास संबंधी पहलुओं पर भी विचार किया जाए। इसके बाद 24 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में महत्वपूर्ण निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि कब्जाधारियों को हटाने से पहले पुनर्वास योजना पर विचार किया जाए। इसके तहत यह निर्धारित करने को कहा गया कि रेलवे को अपनी परियोजना के लिए कितनी भूमि की आवश्यकता है, कितने परिवार इससे प्रभावित होंगे और उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था की जा सकती है। अदालत ने उत्तराखंड सरकार, केंद्र, रेलवे और संबंधित विभागों को आपस में बैठक कर पुनर्वास की रूपरेखा तैयार करने और निर्धारित अवधि में योजना प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। हालांकि रेलवे की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में यह पक्ष रखा गया कि उसके पास अतिक्रमणकारियों के पुनर्वास या मुआवजे के लिए कोई ऐसी नीति नहीं है जिसके तहत इस प्रकार की व्यवस्था की जा सके। रेलवे ने भूमि को अपना बताया: रेलवे और राज्य सरकार की ओर से लगातार यह पक्ष रखा गया है कि विवादित भूमि रेलवे की है और वहां किया गया कब्जा वैधानिक अधिकार नहीं देता। रेलवे की ओर से 1959 की रेलवे भूमि योजना और वर्ष 1972 में राज्य की ओर से भूमि की स्थिति स्पष्ट किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। वहीं प्रभावित परिवारों की ओर से नगर निकाय का कर भुगतान, लंबे समय से निवास, पानी और अन्य सुविधाओं के कनेक्शन तथा आधार कार्ड सहित विभिन्न दस्तावेजों में उसी पते का उल्लेख किए जाने को अपने पक्ष में आधार बताया गया है। रेलवे का तर्क रहा है कि ऐसे दस्तावेज किसी व्यक्ति को रेलवे भूमि पर वैधानिक स्वामित्व या कब्जे का अधिकार प्रदान नहीं करते।
बनभूलपुरा और गफूरबस्ती क्षेत्र में अतिक्रमण के खिलाफ वर्ष 2007 से अदालत में उठता रहा मामला
हल्द्वानी। रेलवे और सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ता रविशंकर जोशी के मुताबिक बनभूलपुरा और गफूरबस्ती क्षेत्र में रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने का मामला वर्ष 2007 में भी नैनीताल हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचा था। उस समय प्रशासन ने करीब 2400 वर्गमीटर भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया था। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013 में गौला नदी में अवैध खनन और गौला पुल के क्षतिग्रस्त होने के मामले में उन्होंने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान रेलवे भूमि पर अतिक्रमण का मामला भी सामने आया। 9 नवंबर 2016 को हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए रेलवे को दस सप्ताह के भीतर समस्त अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद अतिक्रमणकारियों और प्रदेश सरकार की ओर से हाईकोर्ट में शपथ पत्र दाखिल कर संबंधित भूमि को प्रदेश सरकार की नजूल भूमि बताया गया था। हालांकि 10 जनवरी 2017 को अदालत ने इस दावे को खारिज कर दिया। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई विशेष याचिकाएं दाखिल की गईं। सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमणकारियों और प्रदेश सरकार को अपने व्यक्तिगत प्रार्थना पत्र हाईकोर्ट में दाखिल करने तथा उनका परीक्षण कराने के निर्देश दिए थे। रविशंकर जोशी के अनुसार 6 मार्च 2017 को हाईकोर्ट ने रेलवे को अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली अधिनियम 1971 के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए थे, लेकिन इसके बाद भी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। कार्रवाई न होने पर उन्होंने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका भी दाखिल की। रेलवे और जिला प्रशासन की ओर से अदालत में अपना पक्ष रखा गया, लेकिन विवाद का स्थायी समाधान नहीं हो सका। उन्होंने बताया कि 21 मार्च 2022 को फिर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर रेलवे पर अपनी भूमि से अतिक्रमण हटाने में नाकाम रहने का आरोप लगाया गया। 18 मई 2022 को अदालत ने प्रभावित लोगों को अपने तथ्य न्यायालय के समक्ष रखने के निर्देश दिए। इसके बाद 20 दिसंबर 2022 को हाईकोर्ट ने रेलवे को अतिक्रमणकारियों को एक सप्ताह का नोटिस जारी कर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप से ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगी। अब पुनर्वास, रेलवे भूमि पर कब्जे की वैधता और अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सुनवाई के बाद 9 सितंबर को मामले में महत्वपूर्ण आदेश या फैसला आने की संभावना है। शीर्ष अदालत के निर्णय से बनभूलपुरा क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे भूमि विवाद की आगे की दिशा तय होगी।

