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आपातकाल लोकतंत्र पर लगा काला धब्बा: धामी

देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आपातकाल की वर्षगांठ पर कहा कि 25 जून 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उन्होंने कहा कि सत्ता के अहंकार में डूबी तत्कालीन कांर्गेस सरकार ने देश पर आपातकाल थोपकर लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों पर गंभीर प्रहार किया था। मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि आपातकाल के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई और लोकतंत्र की आवाज को दबाने का प्रयास किया गया। लाखों नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं को बिना सुनवाई के जेलों में बंद कर दिया गया तथा संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। यह भारतीय लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना के विपरीत था। उन्होंने कहा कि आपातकाल केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं और संवैधानिक मर्यादाओं पर किया गया सीधा प्रहार था। इसके बावजूद अनेक लोकतंत्र सेनानियों ने साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ संघर्ष किया तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज का दिन उन सभी लोकतंत्र सेनानियों और प्रहरियों को श्रद्धापूर्वक नमन करने का अवसर है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अन्याय और दमन के विरुद्ध आवाज उठाई। उनके त्याग, संघर्ष और बलिदान के कारण ही भारत विश्व का सबसे बड़ा और सशक्त लोकतंत्र बना हुआ है। उन्होंने प्रदेशवासियों से लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान की गरिमा और नागरिक कर्तव्यों के प्रति सदैव सजग रहने का आ“वान करते हुए कहा कि लोकतंत्र की रक्षा और उसे सशक्त बनाने की जिम्मेदारी हम सभी की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को भी आपातकाल के इतिहास और उससे मिले सबक से अवगत कराना आवश्यक है, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती बनी रहे। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार द्वारा लोकतंत्र के सेनानियों बुलाकर उनका हमेशा सम्मान करती रही है। साथ ही उन्हें दुःख होता है कि हर बार लोकतंत्र सेनानियों की संख्या कम होती जा रही है। श्री धामी ने कहा कि लोकतंत्र सेनानियों को यहां देखकर उन्हें ऐसा लगता है कि उनके पिताजी भी स्वयं यहां चलकर आ गये हैं। श्री धामी ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र की हत्या की और संविधान का गला घोंटा। इस दौरान जिस लोकतंत्र सेनानी ने इसके विरूद्ध आवाज उठाई उसे सलाखों के पीछे धकेल दिया गया। जिसमें अटल विहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवानी सहित कई लोकतंत्र सेनानी शामिल हैं।

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