इतिहास के पन्नों से…कांग्रेस ने तो सोना रखने को ही घोषित कर दिया था अपराध !
कांग्रेस सरकारों ने कभी सोने पर कानूनी पाबंदी लगाई, कभी जनता से गहने दान करने, उपवास रखने और खर्च में कटौती की अपील की
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से संयम और सतर्कता बरतने की अपील पर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है। विपक्ष इसे सरकार की आर्थिक चिंताओं से जोड़ते हुए राजनीतिक हमला कर रहा है। लेकिन यदि इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। देश पर संकट के समय कांग्रेस की सरकारों ने न केवल जनता से त्याग और सादगी अपनाने की अपील की, बल्कि कई बार कठोर आर्थिक फैसले लेते हुए सोने के स्वामित्व और व्यापार तक पर कानूनी प्रतिबंध लगाए। दरअसल, स्वतंत्र भारत के आर्थिक इतिहास में कई ऐसे अवसर आए जब सरकारों ने नागरिकों से व्यक्तिगत सुविधाओं और उपभोग में कटौती करने को कहा। कभी महिलाओं से अपने गहने राष्ट्र रक्षा कोष में दान करने का आ“वान किया गया, तो कभी लोगों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने और भोजन की आदतें बदलने की अपील की गई। विदेशी मुद्रा संकट के दौर में सोना खरीदने से बचने का आग्रह किया गया, जबकि बढ़ती सब्सिडी के बोझ पर यह तक कहा गया कि पैसा पेड़ों पर नहीं उगता। 1962ः जब नेहरू ने महिलाओं से गहने दान करने को कहा: 1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति पर भारी दबाव पड़ा। रक्षा जरूरतों को पूरा करने और संसाधन जुटाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देशवासियों से राष्ट्रीय रक्षा कोष में योगदान देने की अपील की। महिलाओं से विशेष रूप से अपने स्वर्ण आभूषण दान करने का आग्रह किया गया। उस समय इसे देशभक्ति और राष्ट्रीय कर्तव्य का प्रतीक बताया गया। देशभर में लाखों परिवारों ने इस आ“वान का समर्थन किया और बड़ी मात्रा में स्वर्ण आभूषण सरकार को सौंपे गए। यह स्वतंत्र भारत में जनता से त्याग और योगदान की सबसे बड़ी अपीलों में से एक मानी जाती है। 1962 से 1968ः सोने पर नियंत्रण का सख्त दौररू चीन युद्ध के बाद विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और बढ़ते स्वर्ण आयात को देखते हुए केंद्र सरकार ने स्वर्ण नियंत्रण नीतियां लागू कीं। 1962 के स्वर्ण नियंत्रण आदेश और बाद की नीतियों के तहत सोने के आयात, व्यापार और स्वामित्व पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। 1963 में 14 कैरेट से अधिक शु(ता वाले आभूषणों के निर्माण पर रोक लगा दी गई। इसके बाद 1968 के गोल्ड कंट्रोल एक्ट ने इन प्रतिबंधों को और कठोर बना दिया। नागरिकों के लिए सोने की ईंटें और सिक्के रखना प्रतिबंधित कर दिया गया तथा ज्वैलर्स पर भी सख्त नियम लागू किए गए। उस दौर में आम धारणा थी कि सरकार ने सोना रखने को लगभग अपराध की श्रेणी में ला दिया है। 1966ः इंदिरा गांधी का फ्सोने के खिलाफ युद्ध 1966 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संसद में कहा कि भारत को फ्सोने की लतय् से मुक्त करना होगा। उन्होंने तर्क दिया कि अत्यधिक स्वर्ण आयात विदेशी मुद्रा के बहुमूल्य भंडार को कमजोर कर रहा है। इंदिरा गांधी ने कहा कि देश को सोने के प्रति आकर्षण कम करना होगा और निवेश को उत्पादक क्षेत्रों की ओर मोड़ना होगा। सरकार ने सोने की मांग कम करने के लिए जनजागरण अभियान भी चलाए और इसे राष्ट्रीय आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।1950 का दशकः भोजन की आदतें बदलने की अपीलरू स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में भारत खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। इस दौरान जवाहरलाल नेहरू ने नागरिकों से भोजन की आदतों में बदलाव करने की अपील की। उन्होंने उत्तर भारत के लोगों से चावल का उपभोग कम करने का सुझाव दिया ताकि सीमित संसाधनों का संतुलित उपयोग किया जा सके। सरकार का मानना था कि यदि लोग अपनी खान-पान की आदतों में बदलाव करेंगे तो खाद्यान्न संकट से निपटना आसान होगा। 1965ः लाल बहादुर शास्त्री का सोमवार उपवास 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध और देश में खाद्यान्न संकट के बीच प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नागरिकों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने और सोमवार को एक समय भोजन छोड़ने की अपील की। देशभर में होटल और रेस्तरां भी सोमवार को बंद रखे जाते थे। शास्त्री का यह आ“वान राष्ट्रीय अनुशासन और त्याग का प्रतीक बन गया। जनता ने इसे व्यापक रूप से स्वीकार किया और यह अभियान देश के इतिहास में मिसाल के रूप में दर्ज हो गया। 2013ः चिदंबरम ने कहा सोना कम खरीदिए: संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल में भारत का चालू खाता घाटा चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया। स्वर्ण आयात को इसका प्रमुख कारण माना गया। तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने 2013 में कई बार लोगों से सोना खरीदने से बचने की अपील की। उन्होंने कहा कि सोने की बढ़ती मांग विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव डाल रही है और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है। इसके बाद सोने के आयात शुल्क में बढ़ोतरी सहित कई कदम उठाए गए।फ्पैसे पेड़ों पर नहीं उगतेय्ः मनमोहन सिंह : पेट्रोलियम और उर्वरक सब्सिडी के बढ़ते बोझ के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि फ्पैसा पेड़ों पर नहीं उगता। उनका आशय यह था कि सरकार के संसाधन सीमित हैं और लोकप्रिय योजनाओं तथा सब्सिडी का खर्च अंततः अर्थव्यवस्था पर असर डालता है। यह बयान उस समय काफी चर्चा में रहा और इसे आर्थिक यथार्थ का स्पष्ट संदेश माना गया। हरदीप पुरी का आश्वासन : हाल ही में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि देश में फिलहाल ईंधन की कोई कमी नहीं है और सरकार सभी परिस्थितियों पर नजर बनाए हुए है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सामान्य बनी हुई है और घबराने की कोई जरूरत नहीं है। भारत के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का निष्कर्ष स्पष्ट है जब भी देश संकट के दौर से गुजरा, सरकारों ने जनता से त्याग, संयम और अनुशासन की अपेक्षा की। यह किसी एक दल की नीति नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया गया एक व्यवहारिक दृष्टिकोण रहा है। आज यदि संयम और सादगी की अपील को लेकर राजनीतिक विवाद हो रहा है, तो इतिहास यह याद दिलाता है कि कांग्रेस सरकारें भी ऐसे कदम उठाने से पीछे नहीं हटी थीं। सोना दान करने से लेकर उसे नियंत्रित करने तक, उपवास रखने से लेकर खर्च घटाने तककृभारतीय राजनीति में जनता से सहयोग मांगने की यह परंपरा दशकों पुरानी है।
