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उत्तराखण्ड में बढ़ता जा रहा भालू, गुलदार व जंगली सूअर का आतंक,मूकदर्शक बना वन महकमा

इस वर्ष भालू के हमले में 6 लोगों की हुई मौत, वन्यजीवों के हमले में 25 लोग घायल हुए
देहरादून/चमोली(उद ब्यूरो)। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में आबादी के बीच अक्सर गुलदार और बाघों की मौजूदगी दर्ज की जाती है। लेकिन अब भालू ने भी अपनी दस्तक से लोगों की दशहत को कई गुना बढ़ा दिया है। लेकिन सवाल यही है कि इन घटनाओं को रोकने के लिए सरकार ने आजतक किया क्या है? रोकथाम कहाँ है? तकनीकी टीम, गश्त, सुरक्षा उपकरण ये सब कागजों में तो बहुत अच्छा लगता है। जमीन पर क्या हो रहा है? उत्तराखंड के पहाड़ों में भालू, गुलदार, जंगली सूअर का आतंक दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। लोग घर से निकलने से डरने लगे हैं। महिलाएं घास लाने जाएँ तो जान हथेली पर, बच्चे स्कूल जाएँ तो दिल धुकधुक। लेकिन वन विभाग है कि बस मीटिंग करता रहता है, पटाखे फोड़ता रहता है, सलाह देता रहता है? प्रदेश के खासकर गढ़वाल क्षेत्र में भालू द्वारा ग्रामीणों पर हमलों की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। दहशत के कारण ग्रामीणों ने शाम होते ही घरों से निकलना बंद कर दिया है। भालुओं के इन हमलों में इस साल अबतक 6 लोगों की मौत हो चुकी है। हालात ये हैं कि विभाग एक जिले से भालू के आतंक को खत्म करने की रणनीति बनाता है, लेकिन तब तक दूसरा जिला भालू से आतंकित हो रहा होता है। ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में भालू ही सबसे ज्यादा आतंकित कर रहे हैं। देखा जाए तो लोगों पर हमला करने में गुलदार सबसे आगे हैं। उत्तराखंड वन विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार, साल 2000 से लेकर 17 नवंबर 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि गुलदार ने अब तक 546 लोगों की जान ली है। जबकि 2,126 लोग घायल हुए हैं। इसी तरह से हाथी ने 230 लोगों की जान ली है। जबकि 234 लोग हाथी के हमले में घायल हुए हैं। इसी तरह बाघ ने 106 लोगों की जान ली है। जबकि 134 लोग घायल किए हैं। इसी तरह से भालू ने 71 लोगों की जान ली, जबकि 2,009 लोग घायल किए हैं। इसके अलावा अन्य जानवर भी उत्तराखंड में लोगों की जान लेते रहे हैं। सर्पदंश के मामले में अब तक 260 लोग मारे जा चुके हैं। जबकि 1,056 लोग सांप के काटने से घायल हुए हैं। जंगली सूअर भी 30 लोगों की जान ले चुके हैं। जबकि 663 लोगों को उन्होंने घायल किया है। बंदर अब तक 211 लोगों को घायल कर चुके हैं। ततैया 10 लोगों की जान ले चुकी हैं और 16 लोगों को घायल कर चुकी हैं। मगरमच्छ भी उत्तराखंड में 9 लोगों की जान ले चुके हैं, जबकि 44 लोग मगरमच्छ के हमलों से घायल हुए हैं। लगातार घट रही इन जानलेवा घटनाओं के बाद भयग्रस्त ग्रामीणों ने सरकार और वन विभाग से प्रभावी कदम उठाने की मांग की है। ग्रामीणों का आरोप है कि आम आदमी के जीवन की कोई कीमत नहीं रह गई है। इस तरह के हमलों के कारण लोगों का घर से निकलना भी मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि इन क्षेत्रों में पिछले कुछ समय से भालू और गुलदार की आवाजाही लगातार बढ़ रही है। ऐसे में संभावित क्षेत्रों में वन विभाग द्वारा गश्त बढ़ाई जाए। हमलावर वन्यजीवों को पकड़ने के लिए पिंजरे लगाए जाएं और मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। उत्तराखंड का गढ़वाल रीजन इस वक्त भालुओं के आतंक से भयभीत है। ये विशालकाय जानवर लोगों के ऊपर इस कदर हमला कर रहा है कि या तो लोग अपाहिज हो रहे हैं, या अंग-भंग हो रहे हैं या फिर जान गंवा रहे हैं। अपने शिकार को सूंघने में काफी शातिर ये शिकारी दबे पांव दिन और रात लोगों पर हमला कर रहा है। ताजा मामला पौड़ी गढ़वाल जिले का है।बीती 17 नवंबर ;सोमवारद्ध की सुबह पौड़ी गढ़वाल के बीरोंखाल ब्लॉक में एक भालू ने 40 वर्षीय लक्ष्मी देवी ;पत्नी महिपाल सिंहद्ध पर हमला कर उनको गंभीर रूप से घायल कर दिया। लक्ष्मी देवी हर रोज की तरह ही गांव के पास घास काटने गई थीं। उनके साथ गांव की तीन-चार अन्य महिलाएं भी थीं। इसी दौरान झाड़ियों में छिपे भालू को वो देख न सकीं और भालू ने महिला पर अचानक हमला कर दिया। भालू का हमला इतना भयानक था कि महिला की हालत बेहद खराब हो गई थी। उनका चेहरा पूरी तरह खून से लथपथ था। महिला की दाईं आंख और सिर पर गंभीर चोटें आई हैं। हमला के दौरान अन्य महिलाएं चीखने लगी जिससे भालू जंगल में भाग लगा। मदद को पहुंचे ग्रामीणों ने लक्ष्मी देवी को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बीरोंखाल पहुंचाया। बेहतर उपचार के लिए उन्हें हायर सेंटर रेफर कर दिया गया है। वहीं 19 नवम्बर को उत्तराखंड के चमोली जिले के पोखरी ब्लॉक का पाव गांव की 42 वर्षीय रामेश्वरी देवी घास लेने जंगल गई थीं। जब शाम तक भी घर नहीं लौटीं, तो परिजन परेशान हुए, और गाँव वालों के साथ मिलकर ढूंढना शुरू किया लेकिन अंधेरा इतना हो गया था कि सर्च आॅपरेशन रोकना पड़ा। सुबह फिर ढूंढना शुरू किया तो महिला जंगल में 70-80 मीटर खड़ी ढलान पर एक पेड़ के नीचे, खून से लथपथ मिली। भालू ने पूरा चेहरा नोंच लिया था। शरीर के कई हिस्से बु-री तरह ज-ख्मी थे। रामेश्वरी देवी जिंदा थीं, लेकिन किस हाल में? पूरी रात भालू के हमले के बाद अकेली, दर्द में तड़पती हुईं, डर से काँपती हुईं गुजारी। किसी तरह पेड़ के पास छिपकर अपनी जान बचाई। महिला को पहले पोखरी सीएचसी पहुँचाया गया। हालत इतनी गं-भीर थी कि उन्हें तुरंत एम्स )षिकेश भेज दिया गया। चमोली जिले में इस साल अन्य वन्यजीवों की अपेक्षा भालू ज्यादा आक्रामक बना हुआ है। वन्यजीवों के हमले में इस वर्ष 25 लोग घायल हुए हैं जिनमें 12 हमले भालू के थे। मौजूदा समय में जिले के सभी क्षेत्रों में भालू की दहशत बनी है। सबसे ज्यादा भालू प्रभावित क्षेत्र ज्योतिर्मठ में सक्रिय है। यहां शाम होते ही भालू आबादी क्षेत्र में पहुंच रहा है। विकासखंड दशोली, पोखरी, नंदानगर, देवाल, थराली, कर्णप्रयाग क्षेत्रों में भी भालू सक्रिय है। भालू जिले में 30 से अधिक मवेशियों को भी मार चुका है। पिछले पांच वर्षों की तुलना में इस वर्ष भालू के हमले बढ़े हैं। 2022-23 में भालू ने 7 लोगों को घायल किया था जबकि इस वर्ष अभी तक वह 12 लोगों पर हमला कर चुका है। 2023-24 में भालू की सक्रियता बढ़ी थी। तब भालू ने 11 लोगों को जख्मी किया था जिनमें से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के पूर्व डीएफओ इंद्र सिंह नेगी का कहना है कि जंगल घट रहे हैं। भालू को जंगल में पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है। शीतकाल में भालू शीत निंद्रा में चला जाता है। इस दौरान इनके शरीर को चर्बी चाहिए होती है। शीतनिंद्रा में जाने से पहले वह भोजन करता है। भालू 15 सितंबर से जनवरी माह तक सक्रिय रहता है। सरकार की घास्यारी योजना का क्या हुआ? पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में पहाड़ की कामकाजी महिलाओं को राहत देने के लिए पशुओं का चारा देने की योजना चलाई गई थी। लेकिन यह योजना धरातल पर कहीं भी नजर नहीं आ रही है। जंगल में पशुओं के लिए चारा लाने के लिए महिलाओं को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ रही है। लोग कब तक अपनों को इस तरह खोते रहेंगे? कब तक भालू और गुलदार पहाड़ियों को अपना शिकार बनाते रहेंगे? कब तक प्रशासन सिर्फ सतर्क रहने की सलाह देता रहेगा? और सतर्क कैसे रहे भाई? घरों से बाहर ही न निकले अब? ये कोई पहली घटना नहीं है, और दुख की बात ये है कि आखिरी भी नहीं होगी। एक के बाद एक नाम जुड़ रहे हैं और आगे भी जुड़ते चले जाएँगे। पता नहीं अगली रामेश्वरी देवी कौन होगी? प्रदेश के करीब 490 गांवों में इन दिनों वन्यजीवों की दहशत फैली हुई है। बीते कुछ ही दिनों के भीतर कई लोग वन्य जीवों का शिकार हो चुके हैं। लोग खुद को न तो खेत-खलिहानों और न घरों में ही सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इन गांवों में वन्यजीव घरों में भी लोगों को मार चुके हैं इसके बावजूद वन महकमा मूकदर्शन बना हुआ है।
जंगल अकेले न जाएं, झाड़ियों को काटें : तकनीकी टीम सक्रिय करने के निर्देश
चमोली। पंचायती राज मंत्री सतपाल महाराज ने वन विभाग एवं पंचायतीराज विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक की। पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की और आमजन, विशेषकर बच्चों एवं ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। ग्राम पंचायतों में उगी झाड़ियां जंगली जानवरों के छिपने का स्थान बन रही हैं। इसे देखते हुए पंचायत विभाग को मनरेगा के अनटाइड फंड से इन झाड़ियों के शीघ्र कटान के निर्देश दिए हैं।वन क्षेत्राधिकारी नवल किशोर ने बताया कि महिला रामेश्वरी देवी को एक लाख रुपये मुआवजा दिया जाएगा। उन्होंने ग्रामीणों व खासकर महिलाओं से अपील की है कि जंगल अकेले न जाएं, जंगल में हल्ला मचाते हुए जाएं ताकि जानवर आसपास हो तो भाग जाए। खेतों में भी समूह बनाकर जाएं। रास्ते और खेतों के आसपास की झाड़ियों की सफाई कर लें। प्रभारी जिलाधिकारी@सीडीओ डॉ. अभिषेक त्रिपाठी ने बताया कि वन विभाग के अधिकारियों को भालू प्रभावित क्षेत्रों में तकनीकी टीम सक्रिय करने के निर्देश दिए हैं। रात और सुबह की नियमित गश्त करने और जरूरी उपकरणों से लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।

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