August 30, 2026

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मनुष्य मालिक के हाथ की कठपुतली के समानःजसदीप सिंह गिल

राधास्वामी सत्संग घर में दूसरे दिन करीब दो लाख श्रद्धालुओं ने सुना सत्संग, धर्म और जाति के नाम पर बंटने से बचने की दी सीख

रूद्रपुर। किच्छा रोड स्थित राधास्वामी सत्संग घर में आयोजित सत्संग के दूसरे दिन राधास्वामी सत्संग ब्यास से पहुंचे हजूर साहब डॉ. जसदीप सिंह गिल जी ने करीब दो लाख श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि इस सृष्टि को बनाने और चलाने वाला मालिक अर्थात परमात्मा एक ही है, लेकिन मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए उसे विभिन्न धर्मों और जातियों में बांट दिया है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आपसी भेदभाव से ऊपर उठकर परमात्मा की भक्ति और मानवता के मार्ग पर चलने का आहवान किया। हजूर साहब डॉ. जसदीप सिंह गिल ने कहा कि मनुष्य को यह समझना चाहिए कि जीवन में जो कुछ भी होता है, उसमें मालिक की मर्जी शामिल होती है। हमारी सफलता और असफलता में भी मालिक की दया और मेहर होती है, इसलिए हमें हर परिस्थिति में उसका शुक्रिया अदा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर यह सोचता है कि वह जो कुछ कर रहा है, अपनी क्षमता और मेहनत से कर रहा है, लेकिन जन्म, मृत्यु, यश और अपयश जैसी चीजें उसके हाथ में नहीं हैं। मनुष्य मालिक के हाथ की कठपुतली है और उसी की इच्छा के अनुसार जीवन आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि जीवन में थोड़ी सी परेशानी आते ही मनुष्य का मन डोलने लगता है और मालिक पर उसका विश्वास कमजोर पड़ जाता है। ऐसे समय में भी विश्वास बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज धन कमाने की होड़ और भागदौड़ में मनुष्य बेईमानी, ठगी, चोरी, डकैती, लूट और हत्या तक करने से गुरेज नहीं करता, लेकिन यह नहीं समझता कि मृत्यु के बाद वह धन और संसार की कोई वस्तु अपने साथ नहीं ले जा सकता। हजूर जी ने कहा कि मनुष्य के भीतर पैदा होने वाली इच्छाएं और विकार ही उसे गलत रास्ते पर ले जाते हैं। इसलिए सबसे पहले अपने मन को काबू में करना आवश्यक है। इसके लिए सुमिरन और भजन का मार्ग अपनाना चाहिए तथा सतगुरु की शरण में जाकर नामदान प्राप्त कर उसका जाप करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपने भीतर झांकना शुरू करता है तो उसे जीवन की वास्तविकता और परमात्मा से अपने संबंध को समझने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि लोग आशाओं और तृष्णाओं में फंसे हुए हैं। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इसी आपाधापी में मनुष्य अपना पूरा जीवन निकाल देता है और उसे पता ही नहीं चलता कि मृत्यु कब सामने आ गई। उन्होंने कहा कि आज कम उम्र के युवाओं को भी हार्ट अटैक जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, फिर भी मनुष्य यह सोचकर चलता है कि मौत दूसरों के लिए है। इसलिए जीवन की वास्तविकता को समझना और समय रहते आध्यात्मिक मार्ग अपनाना जरूरी है। हजूर साहब ने कहा कि बड़े अफसोस की बात है कि आज अधिकतर लोगों ने सत्संग को भी केवल रीति रिवाज बना लिया है। लोग सत्संग में आते हैं, सुनते हैं और वापस चले जाते हैं, लेकिन उसके वास्तविक उद्देश्य और संदेश को अपने जीवन में उतारने का प्रयास नहीं करते। उन्होंने कहा कि सत्संग का उद्देश्य केवल सुनना नहीं, बल्कि अपने जीवन और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाना है। जब मनुष्य अपने मन को नियंत्रित कर सुमिरन, भजन और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तभी सत्संग की सार्थकता पूरी होती है।

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