September 8, 2026

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मुख्यमंत्री ने की हिमालय दिवस पर ‘हिमालय विभूति सम्मान’ की घोषणा

देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड के विकास का रास्ता पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था के संतुलन से होकर ही निकलेगा। ऐसा विकास जरूरी है, जिसमें सड़कें भी बनें और जंगल भी सुरक्षित रहें, रोजगार के अवसर बढ़ें और नदियां भी निर्मल रहें। पर्यटन को बढ़ावा मिले, लेकिन पहाड़ों की धारण क्षमता का भी पूरा ध्यान रखा जाए।मुख्यमंत्री सोमवार को वीर माधे सिंह भंडारी उत्तराखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में हिमालय दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित ‘हिमालयो नाम नगाधिराजः’ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने हिमालय परिषद में मूलभूत सुविधाओं और संसाधनों में वृद्धि के लिए एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की।उन्होंने कहा कि हिमालय के संरक्षण, संवर्धन और सतत विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा हिमालयी क्षेत्रों के लिए समर्पित विशिष्ट व्यक्तित्वों को ‘हिमालय विभूति सम्मान’ प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान प्रत्येक वर्ष हिमालय दिवस के अवसर पर दिया जाएगा।कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित पांच पोस्टरों का विमोचन भी किया। इनमें सातवें देहरादून अंतरराष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी महोत्सव, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रीमियर लीग, सीमांत बाल विज्ञान कांग्रेस, ज्ञानोत्कर्ष तथा 21वीं उत्तराखंड राज्य विज्ञान कांग्रेस के पोस्टर शामिल हैं। उन्होंने विज्ञान के लोकप्रियकरण पर केंद्रित पत्रिका ‘विज्ञान संप्रेषण’ के पांचवें वार्षिकांक का भी विमोचन किया। जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही चुनौतियां: मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालय हमारे लिए केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि हमारी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। गंगा और यमुना सहित अनेक जीवनदायिनी नदियों का उद्गम हिमालय से होता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि का प्रभाव हिमालयी क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। ग्लेशियरों पर बढ़ता दबाव, पारंपरिक जल स्रोतों पर संकट, अतिवृष्टि, भूस्खलन, वनाग्नि और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएं लगातार नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं।धामी ने कहा कि हिमालय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए विकास कार्यों में विज्ञान, तकनीक, सुरक्षा और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। हिमालय के ग्लेशियर और जल स्रोत प्रभावित होने का सीधा असर नदियों, कृषि, पेयजल और करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ता है। इसलिए हिमालय संरक्षण केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी: मुख्यमंत्री ने कहा कि आने वाली पीढ़ियां हमसे केवल बड़ी इमारतों और चौड़ी सड़कों का हिसाब नहीं मांगेंगी, बल्कि स्वच्छ हवा, स्वच्छ पानी, नदियों और जंगलों का भी हिसाब मांगेंगी। इसलिए आज ही तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ियों को कैसा उत्तराखंड सौंपना है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजगार की आवश्यकता है, लेकिन विकास मॉडल राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। सड़क भी बने और जंगल भी बचें, रोजगार भी बढ़े और नदियां भी निर्मल रहें तथा पर्यटन भी बढ़े और पहाड़ों की धारण क्षमता का भी ध्यान रखा जाए। जनभागीदारी से बनेगा हिमालय संरक्षण का अभियान: धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकारों की नीतियों से संभव नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीवनशैली में बदलाव करना होगा। पानी और बिजली की बचत, प्लास्टिक का कम प्रयोग, स्वच्छता, स्थानीय उत्पादों को अपनाना और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार जैसे छोटे प्रयास बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।उन्होंने कहा कि हिमालय संरक्षण के लिए जनभागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य से 2 सितंबर के बुग्याल दिवस से 9 सितंबर के हिमालय दिवस तक पूरे सप्ताह को ‘हिमालय दिवस सप्ताह’ के रूप में मनाने की शुरुआत की गई है। हिमालय संरक्षण को सरकारी कार्यक्रमों और संगोष्ठियों तक सीमित न रखकर जन-जन का आंदोलन बनाना होगा।मुख्यमंत्री ने कहा कि बुग्याल जैव विविधता और जल स्रोतों के महत्वपूर्ण आधार हैं, जंगल हवा, पानी और मिट्टðी के रक्षक हैं तथा नदियां हमारी सभ्यता की जीवनधारा हैं।संरक्षण के साथ समृद्धि पर जोर: उन्होंने कहा कि हिमालय संरक्षण को पहाड़ की समृद्धि से जोड़ना होगा। गांवों में रोजगार, स्थानीय उत्पादों के लिए बाजार, मातृशक्ति का आर्थिक सशक्तीकरण, प्राकृतिक खेती और पर्यावरण अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देकर पलायन कम किया जा सकता है।हिमालय का संरक्षण और पहाड़ की समृद्धि एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जंगल, बुग्याल, जैव विविधता, नदियां, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय उत्पाद उत्तराखंड की पारिस्थितिक संपदा हैं और यही भविष्य में उसकी आर्थिक शक्ति भी बन सकते हैं। कार्यक्रम में विधायक किशोर उपाध्याय, हेस्को के संस्थापक एवं पप्र भूषण से सम्मानित डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, वीर माधे सिंह भंडारी उत्तराखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. तृप्ता ठाकुर, यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत, विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. राजेश उपाध्याय और यूकॉस्ट के संयुक्त निदेशक डी.पी. उनियाल सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

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