‘मंत्री पद’ मिलने के बाद भी ‘बेघर’ हैं उत्तराखंड के ‘नए मंत्री’
शपथ के एक माह बाद भी नए मंत्रियों को नहीं मिल सकी कोठियां,अपने निजी या अस्थाई ठिकानों से ही चला रहे हैं मंत्रलय का कामकाज
देहरादून। भाजपा विधायक खजानदास, राम सिंह कैड़ा, मदन कौशिक, प्रदीप बत्र और भरत चौधरी चार साल के लंबे इंतजार के बाद सूबे के कैबिनेट मंत्री तो बन गए ,लेकिन मंत्रियों को मिलने वाली आवास सुविधा हासिल करने का उनका इंतजार अभी भी खत्म नहीं हुआ है। कहने की जरूरत नहीं की राज्य के मंत्रिमंडल में जगह बनाने के बाद प्रायः हर मंत्री की पहली ख्वाहिश होती है कि राजधानी की बेहद प्रतिष्ठा पूर्ण यमुना कॉलोनी में ही उसे आवास आवंटित हो ,लेकिन दुर्भाग्य से उत्तराखंड के नए मंत्रियों कि यह ख्वाहिश फिलहाल पूरी होती नजर नहीं आती। वह इसलिए, क्योंकि राजधानी की यमुना कॉलोनी में मंत्रियों को आवंटित किए जाने वाले घरों की हालत बेहद जर्जर है और उन्हें किसी मंत्री के रहने योग्य बनाने की कवायद युद्ध स्तर पर जारी है। लिहाजा, सभी नए मंत्री अभी तक अपने निजी या अस्थायी ठिकानों से ही अपने अपने मंत्रलय का कामकाज चला रहे हैं। हालांकि राजधानी की यमुना कॉलोनी स्थित सबसे चर्चित और वीआईपी मानी जाने वाली कोठी आर-2 पर कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्र की नेम प्लेट लगा दी गई है ,लेकिन वह अभी तक उपरोक्त आवास में शिफ्ट नहीं हुए हैं। याद दिलाना होगा कि 20 मार्च को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया था। इस विस्तार में पांच विधायकों खजानदास, राम सिंह कैड़ा, मदन कौशिक, प्रदीप बत्र और भरत चौधरी को कैबिनेट में शामिल किया गया। मंत्री बनने के बाद इन सभी को विभाग भी आवंटित कर दिए गए और इन्होंने अपने-अपने विभागों की जिम्मेदारी संभालते हुए बैठकों और समीक्षा कार्यों की शुरुआत भी कर दी लेकिन उनका गृह प्रवेश नहीं हो सका। दरअसल, उत्तराखंड में मंत्रियों को सरकारी आवास देने की जिम्मेदारी राज्य संपत्ति विभाग की होती है, मगर विभाग अब तक यह तय नहीं कर पाया है कि किस मंत्री को कौन सा आवास दिया जाए। नव नियुक्त मंत्रियों को आवास आवंटित न हो पाने के पीछे जो सबसे बड़ी वजह निकल कर सामने आ रही है, वह यमुना कॉलोनी की सरकारी कोठियों की खराब हालत है। इन आवासों की स्थिति काफी जर्जर हो चुकी है और इनमें मरम्मत और रखरखाव का काम तेजी से चल रहा है। राज्य संपत्ति विभाग इन कोठियों को तेजी से ठीक करने में जुटा हुआ है, ताकि मंत्रियों को रहने लायक स्थिति में आवास उपलब्ध कराया जा सके, परंतु वर्तमान हालात को देखते हुए यह कहना तनिक मुश्किल है कि आने वाले कुछ दिनों में सभी मंत्रियों को आवास मिल पाएंगे या नहीं। दरअसल, कुछ कोठियों की स्थिति इतनी खराब बताई जा रही है कि उन्हें पूरी तरह से रहने योग्य बनाने में अभी और समय लग सकता है। कुल मिलाकर एक महीने से बिना सरकारी आवास के काम कर रहे मंत्रियों के लिए यह स्थिति खासी असहज मानी जा रही है। खासकर तब, जब वे अपने-अपने विभागों में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं और जनता से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले ले रहे हैं। ऐसे में आवास जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव प्रशासनिक तैयारियों पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। बड़ा सवाल तो यह है कि जब मंत्रिमंडल विस्तार पहले से तय था, तो आवासों की मरम्मत और तैयारी का काम पहले क्यों नहीं किया गया? आमतौर पर ऐसे वीआईपी आवासों का रखरखाव नियमित रूप से होना चाहिए, चाहे उनमें कोई मंत्री रह रहा हो या नहीं। लेकिन मौजूदा स्थिति यह दर्शाती है कि विभाग ने इस दिशा में पहले से कोई ठोस तैयारी नहीं की थी। मजे की बात तो यह है कि इस मुद्दे पर जब राज्य संपत्ति विभाग के अधिकारियों से संपर्क कर उनकी प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, तो उन्होंने इस मसले पर टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया।
