कभी नहीं भुला पायेंगे नाना पाटेकर की अदाकारी …सोशल मीडिया पर खूब लोकप्रिय है मीम्स
आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…अड़ियल क्रांतिवीर चला गया
मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर की फिल्म ‘वेलकम’ का कॉमेडी अंदाज आज भी सोशल मीडिया पर खूब लोकप्रिय है। फिल्म में उनका हंसने वाला अंदाज और संवाद अक्सर मीम्स और कॉमेडी वीडियो में इस्तेमाल किए जाते हैं। सोशल मीडिया यूजर्स नाना पाटेकर के इस खास अंदाज को काफी पसंद करते हैं और उनके चेहरे के हाव-भाव से जुड़े वीडियो आए दिन वायरल होते रहते हैं। उनकी इस अदाकारी को देश के प्रशंसक कभी नहीं भुला पायेंगे।
आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…अड़ियल क्रांतिवीर चला गया
कल शाम तक ये सिर्फ नाना पाटेकर की फ़िल्म का एक डायलॉग था और आज सुबह ये सच्चाई बन गया।
8 अक्टूबर 2026, सुबह 5 बजकर 20 मिनट – डोना पाउला, गोवा में 75 साल के नाना पाटेकर अपने घर में बेहोश मिले। मणिपाल हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने 45 मिनट तक CPR किया, पर वो वापस नहीं आए।
4 दिन पहले ही वो इसी गोवा में मंच पर थे, सफेद कुर्ता, सफेद गमछा पहने बड़ी बेबाकी से कह रहे थे –
“हम सबको एक न एक दिन जाना ही है। मुझे नहीं पता कि मैं कल यहाँ रहूँगा या नहीं…”
और आज वो नहीं रहे।
नाना का सफर फिल्मी नहीं, असली ज़िंदगी की किताब था।
1951 में मुरुड-जंजिरा में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर को बचपन में ही घर की ज़िम्मेदारी मिल गई। पिता का धंधा बंद हो गया तो 13 साल की उम्र में स्कूल के बाद मुंबई की सड़कों पर ज़ेबरा क्रॉसिंग पेंट करने लगे…
फिल्मों के पोस्टर रंगते थे, 35 रुपये महीना और एक वक्त का खाना – बस इतने में ही उनका घर चलता था।ज़्यादा चीज़ें इक्कठे करने के शौक़ीन नहीं थे।
वहीं से जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स, थियेटर, और फिर 1978 में फ़िल्म गमन से शुरू हुआ वो फ़िल्मी सफर जो परिंदा, क्रांतिवीर, अग्नि साक्षी के लिए 3 नेशनल अवॉर्ड और 2013 में पद्मश्री तक ले गया।
उनका एक्टिंग का स्कूल ही अलग था। वो डायलॉग नहीं, दो डायलॉग के बीच के सन्नाटे से एक्टिंग करते थे। वो जब गंभीर और बागी किरदार में पर्दे पर आते थे तो उनका गुस्सा, उनकी सिस्टम की चिढ़ दर्शक ख़ुद महसूस करता था…
क्रांतिवीर का वो सीन आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने आज भी लोगों को थिएटर में ताली बजाने पर मजबूर कर देता है।
तो यही आदमी वेलकम में उदय शेट्टी बनकर हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देता है।
लेकिन नाना सिर्फ रील लाइफ के हीरो नहीं थे।
वे 1988 में टेरिटोरियल आर्मी में कैप्टन बने, इसके बाद 1991 में अपनी फ़िल्म प्रहार के लिए उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ 3 साल की असली मिलिट्री ट्रेनिंग ली।
और कारगिल युद्ध में जब दुश्मन हमारे सर पर आ बैठा था तब वे ख़ुद युद्ध मोर्चे पर गए और जाकर जवानों का हौसला बढ़ाया। बाद में लेफ्टिनेंट कर्नल तक पहुंचे और 2013 में रिटायर हुए।
वो फ़िल्मी दुनिया में रहे लेकिन अंदर से हमेशा एक किसान ही रहे, वो अपने फार्महाउस पर खेती करते और जो उगता उसे बेचकर जरुरतमंद लोगों की मदद कर देते।
उनकी ज़िंदगी का एक किस्सा जो उन्हें सबसे अलग बनाता है… वे 1.5 करोड़ रुपए की लग्ज़री गाड़ी लेने जा रहे थे, लेकिन तभी उन्होंने टीवी पर किसानों की आत्महत्या की ख़बरें देखी, तब वो गाड़ी ख़रीदने शोरूम नहीं गए।
वहीं पैसों से 15-15 हजार के चेक बनाए और खुद महाराष्ट्र के गांवों में जाकर बांट दिए।
इतने से भी मन नहीं भरा तो फिर मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन बनाया, जिसके द्वारा आज भी सूखा पीड़ित किसानों को आर्थिक सहायता, हजारों गांवों में पानी पहुंचाया।
उन्होंने करोड़ों, अरबों रुपए कमाए, चाहते तो आलीशान बंगले में रह सकते थे, पर वो अपनी माँ के साथ अंधेरी के एक छोटे से 1 BHK फ्लैट में रहे। ज़मीन पर बैठकर खाना खाया और शूटिंग के दौरान अपने हाथ से सबके लिए खाना बनाया।
नाना पाटेकर बाहर से जितने सख्त, गुस्सैल और अड़ियल थे, अंदर से उतने ही भावुक, संवेदनशील और मददगार थे।
वे बॉलीवुड के उन गिने-चुने कलाकारों में से थे जो कभी मुखौटा पहनकर नहीं जिए। उनका जो मिजाज पर्दे पर दिखता था, असल जिंदगी में भी वे वैसे ही बेबाक और सीधे मुंह सच बोलने वाले इंसान थे।
वे फिल्मी पार्टियों से दूर रहते थे और किसी को खुश करने के लिए कभी झूठी तारीफ नहीं करते थे। उनकी इसी बेबाकी के कारण कई बार लोग उन्हें अड़ियल समझ लेते थे
आज ये अड़ियल क्रांतिवीर चला गया, लेकिन नाना का जाना सिर्फ एक एक्टर का जाना नहीं है, एक पूरे दौर का खत्म होना है।
उन्होंने पूरी जिंदगी अपनी शर्तों पर जी, बिना किसी चाटुकारिता के, बिना किसी पीआर एजेंसी के, और बिना किसी बनावट के।


