बदियाकोट के पौराणिक आदि बद्री मां भगवती मंदिर में लगी आग, घटना से श्रद्धालु बेहद दुखी
मां भगवती ने दैत्य निशुंभ का वध किया था
बागेश्वर, उत्तराखंड। बागेश्वर जिले के कपकोट विधानसभा क्षेत्र के बदियाकोट स्थित आदि बद्री मां भगवती मंदिर में तड़के सुबह आग लगने की घटना सामने आई है। मंदिर में आग लगने की सूचना से क्षेत्र में हड़कंप मच गया।प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, आग सुबह के समय लगी। हालांकि, आग लगने के कारणों और मंदिर को हुए नुकसान के संबंध में फिलहाल विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।घटना के बाद स्थानीय लोगों में चिंता का माहौल है। स्थानीय लोगों ने घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए हैं। लोगों ने इस घटना पर दुख जताते हुए नवरात्र के दौरान मंदिर में आग लगने की घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।फिलहाल, आग लगने के कारणों और मंदिर को हुए नुकसान की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। राहत की बात यह है कि इस अग्निकांड में किसी प्रकार की जनहानि की खबर सामने नहीं आई है। घटना से जुड़ी विस्तृत जानकारी और आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है। इसके बाद ही आग लगने के कारणों और मंदिर को हुए नुकसान की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

भक्त भावुक होकर पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र के बदियाकोट स्थित मां भगवती (आदिबद्री) मंदिर में आग लगने की घटना से श्रद्धालु बेहद दुखी हैं। मान्यता है कि इसी पावन धाम में मां ने दैत्य निशुंभ का वध किया था। नवरात्र के समय श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। मंदिर में हर साल शारदीय नवरात्र में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं को निशुम्भ दैत्य के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए मां भगवती ने इसी जगह पर उसका वध किया था। मां भगवती के द्वारा निशुम्भ दैत्य का वध करने का वर्णन मार्कण्डेय पुराण में देखने को मिलता है। वहीं, शुम्भ दैत्य का वध मां भगवती ने सुमगढ़ में किया था। इसी वजह से बाद में इसे सुमगढ़ कहा जाने लगा।पौराणिक कथा के अनुसार, गढ़वाल में एक बार मां भगवती ने मृग का रूप धारण किया। इस मृग का शिकार करने के लिए छलि और बलि ने उसका पीछा किया। इस दौरान वे मृग का पीछा करते हुए बदियाकोट पहुंच गए। जब वे एक छोटी सी पहाड़ी पर पहुंचे, तो माता ने उन्हें कन्या के रूप में दर्शन दिए। देवी ने उन दोनों को पुरानी कथा के बारे में बताया।इसके बाद उन्होंने वहां एक पवित्र मंदिर बनवाया। उन दोनों को वहां का पुजारी बनाया और खुद अंतर्ध्यान हो गईं। छलि और बलि के छह-छह पुत्र हुए। ये 12 भाई बहुत मशहूर हुए। लोग इन्हें ‘बार बदकोटी’ के नाम से पूजने लगे। प्राचीन आस्था और श्रद्धा से जुड़े इस मंदिर में आग लगने की खबर ने भक्तों को गहरा आघात पहुंचाया है। नवरात्रि जैसे पावन पर्व पर मंदिर में हुई इस घटना से श्रद्धालुओं के मन में कई सवाल उठ रहे हैं। भक्त भावुक होकर पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? हालांकि, इस घटना को भक्तों की किसी गलती या अशुभ संकेत से जोड़ने का कोई आधार नहीं है।मां के प्रति आस्था अटूट है। मंदिर को हुए नुकसान का दुख जरूर है, लेकिन श्रद्धालुओं की श्रद्धा और विश्वास को कोई अग्निकांड समाप्त नहीं कर सकता।



