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गैस सिलेंडरों के लिए मचा हाहाकार: 25 दिन की पाबंदी और कालाबाजारी के डर ने बढ़ाई उपभोक्ताओं की धड़कनें, एजेंसियों पर लंबी कतारें

रूद्रपुर (उद संवाददाता)। विश्व के खाड़ी देशों में छिड़े भीषण युद्ध की आंच अब भारतीय रसोई और औद्योगिक विकास तक पहुंचनी शुरू हो गई है। पेट्रोलियम पदार्थों और गैस की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने का सीधा असर अब आम आदमी की जेब और दैनिक जीवन पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। केंद्र सरकार भले ही देश में पर्याप्त भंडार होने के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। हालत यह है कि कल तक जो सिलेंडर एक फोन कॉल पर घर पहुंच जाता था, उसके लिए आज उपभोक्ताओं को कड़ाके की ठंड और अनिश्चितता के बीच पसीने बहाने पड़ रहे हैं। गैस आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने जो कड़े कदम उठाए हैं, उन्होंने आम जनता की मुश्किलों को दोगुना कर दिया है। अब कोई भी घरेलू उपभोक्ता 25 दिन की समय सीमा पूरी होने से पहले अगला सिलेंडर बुक नहीं करा सकता है। इस पाबंदी ने विशेष रूप से उन मध्यमवर्गीय और बड़े परिवारों के सामने संकट खड़ा कर दिया है जिनकी खपत अधिक है। सरकार का तर्क है कि इस कदम से अवैध भंडारण और कालाबाजारी पर प्रभावी रोक लगेगी, लेकिन हकीकत में आम उपभोक्ता इस गहरे डर में जी रहा है कि यदि वर्तमान सिलेंडर बीच में ही खत्म हो गया तो अगला सिलेंडर समय पर मिल पाएगा या नहीं। इसी भारी अनिश्चितता और भय के चलते रूद्रपुर सहित पूरे कुमाऊं क्षेत्र की गैस एजेंसियों पर सुबह पांच बजे से ही लोगों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई हैं, जहां लोग घंटों अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। खाड़ी युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में जो उछाल आया है, उससे भविष्य में घरेलू कीमतों में भारी वृद्धि के संकेत भी मिल रहे हैं। आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि यह वैश्विक तनाव और युद्ध जल्द समाप्त नहीं हुआ, तो इसका खामियाजा देश के कृषि, परिवहन और तमाम औद्योगिक क्षेत्रें को अगले कई महीनों तक भुगतना पड़ सकता है। गैस वितरण केंद्रों पर किल्लत का आलम यह है कि घंटों लाइन में खड़े रहने और अधिकारियों से मिन्नतें करने के बाद भी कई उपभोक्ताओं को खाली हाथ ही घर लौटना पड़ रहा है। वितरण व्यवस्था में आए इस असंतुलन ने सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर दबाव बढ़ा दिया है।

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