रुद्रपुर की घटना से प्रदेशभर में कांग्रेस हुई शर्मसार
कांग्रेस की गुटबाज़ी ने फिर खोली पोल, नेता ही सुरक्षित नहीं तो जनता कैसे रहेगी सुरक्षित?
उधमसिंहनगर। उत्तराखंड में कांग्रेस की सियासत इस कदर गुटबाज़ी की शिकार हो चुकी है कि अब पार्टी अपने ही नेताओं के बीच मारपीट का अखाड़ा बनकर रह गई है। रुद्रपुर में पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में रायशुमारी के दौरान जिस तरह धक्का-मुक्की और हाथापाई हुई, उसने कांग्रेस को पूरे प्रदेश में शर्मसार कर दिया है। धक्का-मुक्की और मारपीट के ताज़ा प्रकरण ने एक बार फिर कांग्रेस की गुटबाज़ी को प्रदेशभर में सुर्खियों में ला दिया है। यह घटना न केवल कांग्रेस की अनुशासनहीनता को उजागर करती है बल्कि यह भी साबित करती है कि सत्ता से बाहर चल रही पार्टी आज भी आपसी खींचतान से बाहर नहीं निकल पा रही है। रायशुमारी बैठक के दौरान धक्का-मुक्की इतनी बढ़ गई कि वरिष्ठ नेता राजेंद्र मिश्रा गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें दिल का दौरा तक पड़ गया। यही नहीं इस दौरान कई कार्यकर्ता एक दूसरे से उलझे है और मारपीट करते रहे। इस दौरान कई कार्यकर्ता को अंदरूनी चोटे लगी है।

यह दृश्य पूरे प्रदेश के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए शर्मनाक रहा। कांग्रेस में पिछले कई सालों से समानांतर संगठन और गुटबाज़ी का खेल चलता आ रहा है। हर नेता अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा है और इसका सीधा नुकसान पार्टी को उठाना पड़ रहा है। विधानसभा चुनावों में लगातार हार और संगठनात्मक कमजोरी इसी अंतर्कलह का परिणाम है। उधर, राहुल गांधी भले ही भारत जोड़ो यात्रा और भारत न्याय यात्रा जैसी पदयात्राओं से जनता के बीच भरोसा जीतने का दावा करते हों, लेकिन उनकी ही पार्टी के भीतर झगड़े और मारपीट यह साफ कर देते हैं कि कांग्रेस “भारत जोड़ो” से पहले खुद को “कांग्रेस जोड़ो” करने की स्थिति में भी नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब पार्टी संगठन ही बिखरा हुआ हो, तो जनता के बीच विश्वास कायम करना मुश्किल हो जाता है। रुद्रपुर की यह घटना कांग्रेस की खोखली एकजुटता का ताज़ा उदाहरण बन गई है। अनुशासन, संगठन और नेतृत्व—तीनों मोर्चों पर पार्टी फेल है। अब सवाल यह है कि जिस पार्टी में नेता ही सुरक्षित नहीं, वहां जनता का भविष्य कितना सुरक्षित होगा?


