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‘बेटा’ तू आ गया तो ‘हिम्मत’ मिल गई : जब तबाही से कांपा पहाड़..तब “पहाड़ जैसा हौसला” लेकर खड़े हो गये “सीएम धामी”

उत्तरकाशी के आपदा पीड़ित लोगों के साथ खड़े नजर आए धामी,संवेदनशीलता और सेवा संकल्प का दिखा जुनून
उत्तरकाशी(उद ब्यूरो)। देवभूमि उत्तराखंड के जनपद उत्तरकाशी की पहाड़ियों में जब मलबा बहा, चट्टठ्ठानें टूटीं और जिंदगियाँ थम-सी गईं तब एक चेहरा था जो मलबे के बीच से उम्मीद बनकर उभरा। वह चेहरा था उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का, जो न केवल राजधानी से बल्कि दिल और धरातल से उत्तरकाशी के आपदा पीड़ित लोगों के साथ खड़े नजर आए। धामी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नेता वह नहीं जो मंच पर भाषण देता है, बल्कि वह होता है जो संकट की घड़ी में चुपचाप सबसे आगे खड़ा होता है – जनता की आँखों में आँसू देखकर उसका हाथ थाम लेता है, और कहता है फ्डरो मत, मैं यहीं हूँ।य् मुख्यमंत्री ने राहत शिविरों में बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं से बातचीत की, उनकी जरूरतें जानीं और उन्हें आश्वस्त किया कि आप अकेले नहीं हैं, पूरा उत्तराखंड आपके साथ है। उन्होंने साफ कहा यह समय केवल सरकारी कार्रवाइयों का नहीं, बल्कि एक परिवार की तरह साथ खड़े होने का है। मैं यहां एक मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि एक उत्तराखंडी बेटे के रूप में हूं। मंगलवार को उत्तरकाशी में आई भीषण आपदा की सूचना जब मुख्यमंत्री को मिली, तो उस वक्त मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आंध्र प्रदेश के दौरे पर थे। आपदा की खबर मिलते ही मुख्यमंत्री एक्टिव हो गए और आंध्र प्रदेश से ही उच्च अधिकारियों को तत्काल बचाव व राहत कार्यों में तेजी लाने के निर्देश दिए तथा धराली में चल रहे राहत व बचाव कार्यों की पल-पल की जानकारी लेते हुए देहरादून पहुंच गए और अगले दिन यानी बुधवार को बिना समय गंवाए उन्होंने तुरंत धराली के लिए प्रस्थान का निर्णय लिया, और सबसे पहले वहाँ पहुँचे जहाँ जरूरत सबसे ज्यादा थी। मौसम प्रतिकूल था, रास्ते अवरु( थे, लेकिन मुख्यमंत्री का संकल्प और सेवा का जुनून अडिग था। उन्होंने अधिकारियों से नहीं पूछा कि मैं जा सकता हूँ? – उन्होंने कहा, फ्मैं चल पड़ा हूँ, व्यवस्था तुम देखो।य् हेलीकॉप्टर से सामग्री वितरण की योजना से लेकर भारी मशीनों के वायुमार्ग से भेजे जाने तक हर फैसले में मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत भागीदारी थी। चिनूक और एमआई-17 जैसे हेलीकॉप्टर जुटवाना हो या हर पीड़ित के लिए भोजन, दवा और बिस्तर का इंतजाम धामी ने हर मोर्चे पर नेतृत्व किया। धरातल पर उतरकर मुख्यमंत्री ने केवल दिशा-निर्देश नहीं दिए, बल्कि खुद आपूर्ति व्यवस्था की निगरानी की। यह सिर्फ प्रशासनिक दक्षता नहीं, संवेदन शीलता और संकल्प का मेल था। मुख्यमंत्री ने यह भी सुनिश्चित किया कि पीड़ितों को मानसिक संबल मिले। एम्स, दून मेडिकल कॉलेज और कोरोनेशन अस्पताल में बेड आरक्षित किए गए और साथ ही विशेषज्ञ मनोचिकित्सकों की टीम भेजी गई – यह दिखाता है कि वे सिर्फ शरीर की नहीं, आत्मा की भी चिंता करते हैं। कल सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं मुख्यमंत्री धामी से फोन पर बात की और ताजा स्थिति की जानकारी ली। मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार की तत्काल और समर्पित कार्यप्रणाली की जानकारी दी, जिस पर प्रधानमंत्री ने हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तरकाशी की आपदा में जो सक्रियता, संवेदनशीलता और सेवा भाव दिखाया, वह उत्तराखंड की राजनीति में एक उदाहरण बनेगा। उनका यह कहना राज्य का हर नागरिक मेरा परिवार है। जब तक अंतिम व्यक्ति तक राहत नहीं पहुँचेगी, मुझे चौन नहीं आएगा। उत्तरकाशी की ठंडी हवा में जब दर्द की चीखें थीं, तभी एक गर्माहट भी थी – मुख्यमंत्री धामी के हाथ की, जो हर कांपते हाथ को थामने वहाँ पहुँचा था।

 बुजुर्ग महिला की आवाज ने किया भावुक
धराली। आपदा की मार झेल रहे उत्तरकाशी के धराली गांव में जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहुंचे, तो राहत शिविर में एक भावुक दृश्य सामने आया। अपने आशियाने से उजड़ चुकी एक बुजुर्ग महिला कांपते हाथों से मुख्यमंत्री का चेहरा छूते हुए बोलीं – फ्बेटा, तू आ गया तो हिम्मत मिल गई।य् उन शब्दों ने माहौल को गहराई से भावुक कर दिया। मुख्यमंत्री की आंखों में भी नमी आ गई। कुछ पल के लिए वे चुप रहे, फिर धीरे से बोले आपका दुख मेरा है। यह क्षण केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी, यह एक मुख्यमंत्री और एक पीड़िता के बीच मानवीय रिश्ते का गहरा जुड़ाव था। सीएम धामी ने न केवल सांत्वना दी, बल्कि हर पीड़ित से व्यक्तिगत संवाद कर उनके दुःख को अपना दुःख समझा। मुख्यमंत्री ने धराली में रातभर रुकने का निर्णय लेकर पीड़ितों अपने होने का एहसास कराया। उन्होंने कहा कि जब तक अंतिम पीड़ित को राहत नहीं मिल जाती, तब तक चौन से नहीं बैठेंगे। उन्होंने राहत शिविरों में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों से मुलाकात कर उनका हाल जाना और हरसंभव सहायता का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा, फ्मैं यहां सरकार बनकर नहीं, आपका अपना बनकर आया हूं। जब तक आप सुरक्षित नहीं, तब तक मेरा कर्तव्य पूरा नहीं।य् मुख्यमंत्री का यह संवेदनशील व्यवहार प्रभावितों के लिए मानसिक संबल बन गया है। उनके आने से राहत शिविरों में न केवल भरोसा लौटा, बल्कि प्रशासनिक मशीनरी में भी एक नई ऊर्जा का संचार हुआ।


जननेता की वह छवि, जो हर दिल को छू गई
उत्तरकाशी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि वे केवल शासन के नहीं, बल्कि सेवा और संवेदना के प्रतीक नेता हैं। उत्तरकाशी में आपदा से उत्पन्न हालात के बीच उन्होंने अपनी पूरी रात राहत क्षेत्र में ही रहकर बिताई, न केवल हालात का जायजा लिया, बल्कि हर जरूरतमंद के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आए। जहाँ आमतौर पर प्रशासनिक दौरों में औपचारिकता की झलक मिलती है, वहीं मुख्यमंत्री धामी का यह रात्रि प्रवास एक मानवीय मिशन बनकर सामने आया। उन्होंने न सिर्फ राहत शिविरों में पहुंचकर प्रभावितों से संवाद किया, बल्कि खुद रातभर अधिकारियों के साथ बैठकें कर हालात की बारीकी से निगरानी की।धामी रात में भी लगातार सक्रिय रहे। आपदा प्रबंधन अधिकारियों के साथ स्थिति की समीक्षा की, प्रभावित इलाकों में खाद्यान्न, पानी, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता पर स्वयं निगरानी रखी। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी व्यक्ति राहत से वंचित न रहे। धामी की यह पहल केवल प्रशासनिक नेतृत्व नहीं, बल्कि संवेदनशील नेतृत्व की मिसाल है। एक ऐसी छवि जो लोगों के दिलों में भरोसा और उम्मीद भरती है। जिन आंखों में भय था, उनमें अब मुख्यमंत्री की उपस्थिति से आश्वासन की चमक दिखी। मुख्यमंत्री धामी का यह व्यवहार राजनीति से परे जाकर जनसेवा की परिभाषा गढ़ता है। उत्तरकाशी की इस रात ने साबित कर दिया कि मुख्यमंत्री केवल राज्य का मुखिया नहीं होता, वह हर उस व्यक्ति की उम्मीद बनता है जो संकट में है। और धामी ने यह भूमिका पूरे समर्पण और संवेदना के साथ निभाई।

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