विधायक अरविंद पांडे और चुफाल की मुलाकात से बढ़ा तराई का सियासी पारा
रुद्रपुर(उद संवाददाता)। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों तराई का क्षेत्र चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है। एक तरफ गदरपुर विधायक अरविंद पांडेय के खिलाफ प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए उनके आवास पर ध्वस्तीकरण का नोटिस चस्पा किया है, तो दूसरी तरफ भाजपा के दो कद्दावर और ‘बागी तेवरों’ वाले विधायकों की गोपनीय मुलाकात ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। डीडीहाट विधायक बिशन सिंह चुफाल का अचानक अरविंद पांडेय के आवास पहुंचना मात्र एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि सत्ता और अफसरशाही के खिलाफ एक नई मोर्चेबंदी के रूप में देखा जा रहा है। प्रशासनिक कार्रवाई और नोटिस का विवाद पिछले कुछ दिनों से विधायक अरविंद पांडेय अपनी ही सरकार के अधिकारियों और कुछ नीतिगत फैसलों के खिलाफ मुखर रहे हैं। चाहे वह खनन का मुद्दा हो या काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह आत्महत्या प्रकरण में सीबीआई जांच की मांग, पांडेय लगातार सुिखर्यों में रहे। इसी बीच, जमीन से जुड़े कुछ पुराने मामले मीडिया में उछलने के बाद प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मंगलवार को विधायक के गूलरभोज स्थित आवास के बाहर नोटिस चस्पा कर दिया। नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि 0-158 हेक्टेयर सरकारी भूमि पर हुए अवैध निर्माण को 15 दिनों के भीतर स्वयं हटा लिया जाए, अन्यथा ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाएगी। जब अरविंद पांडेय के आवास पर नोटिस को लेकर गहमागहमी चल रही थी, तभी पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ विधायक बिशन सिंह चुफाल का वहां पहुंचना कई सवाल खड़े कर गया। ये दोनों ही नेता अपनी ही सरकार की अफसरशाही के खिलाफ खुलकर बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं। चुफाल पूर्व में भी कई बार अधिकारियों की मनमानी पर विधानसभा और सार्वजनिक मंचों पर नाराजगी जता चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पांडेय पर प्रशासन के शिकंजे के बीच चुफाल की यह मुलाकात एक स्पष्ट संदेश है कि सरकार के भीतर वरिष्ठ विधायक अपनी अनदेखी और प्रशासनिक दबाव से असंतुष्ट हैं। बंद कमरे में हुई इस चर्चा को आने वाले दिनों में देहरादून से लेकर तराई तक किसी बड़ी राजनीतिक हलचल की आहट माना जा रहा है। विधायक अरविंद पांडेय पिछले काफी समय से तराई के मुद्दों पर न सिर्फ अफसरों बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को भी कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। अब जब उन पर कानूनी कार्रवाई का दबाव बढ़ाया गया है, तो उनके समर्थकों ने इसे ‘बदले की राजनीति’ और ‘अधिकारियों की साजिश’ करार दिया है। समर्थकों का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। फिलहाल, तराई से लेकर राजधानी देहरादून तक इस मुलाकात और प्रशासन की अगली कार्रवाई को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। क्या यह दो वरिष्ठ विधायकों का गठबंधन सरकार के लिए कोई नई चुनौती खड़ी करेगा या फिर प्रशासन अपने ध्वस्तीकरण के नोटिस पर अडिग रहेगा? इन सवालों के जवाब आने वाले 15 दिनों में मिलने की उम्मीद है।
