February 24, 2026

Uttaranchal Darpan

Hindi Newsportal

यूजीसी के नये नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक : केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया

नई दिल्ली (उद संवाददाता)। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लाए गए नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए फिलहाल रोक लगा दी है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इन नियमों को ‘अस्पष्ट’ करार दिया। यह फैसला उन याचिकाओं पर आया है जिनमें आरोप लगाया गया था कि यूजीसी के नए रेगुलेशन केवल आरक्षित वर्गों को सुरक्षा प्रदान करते हैं, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को संस्थागत सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा गया है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों में स्पष्टता का अभाव है, जिससे भेदभाव की आशंका और बढ़ सकती है। ज्ञात हो कि यूजीसी ने 13 जनवरी को ‘हायर एजुकेशन इंस्टीटयूशन में इक्विटी को बढ़ावा देना’ रेगुलेशन-2026 नोटिफाई किया था, जिसका उद्देश्य 2012 के पुराने नियमों को बदलकर अधिक प्रभावी तंत्र खड़ा करना था। विवाद का केंद्र इन नियमों में दी गई ‘भेदभाव’ की परिभाषा है। याचिकाओं में दलील दी गई है कि नए नियमों के तहत जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक ही सीमित कर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस संकुचित परिभाषा के कारण सामान्य या गैर-आरक्षित श्रेणी के उन छात्रें को शिकायत निवारण के अधिकार से वंचित कर दिया गया है, जिन्हें अपनी जाति की पहचान के कारण संस्थानों में प्रताड़ना का सामना करना पड़ सकता है। नए नियमों के अनुसार, हर उच्च शिक्षण संस्थान में एक ‘समता समिति’ बनाना अनिवार्य था, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया था। लेकिन, इस समिति में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर नियम मौन थे। इसी असंतुलन के कारण देश भर के छात्र संगठनों में आक्रोश फैल गया और कई विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। छात्रों का तर्क है कि न्याय की व्यवस्था समावेशी होनी चाहिए, न कि किसी वर्ग विशेष तक सीमित। यूजीसी ने ये नियम सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों के अनुपालन में ही तैयार किए थे ताकि परिसरों में होने वाले भेदभाव को रोका जा सके। हालांकि, नियमों के प्रारूप में रह गई खामियों ने इसे विवादों में डाल दिया। अब अदालत इस बात की बारीकी से जांच करेगी कि क्या ये नियम संविधान की मूल भावना और ‘समानता के अधिकार’ का उल्लंघन करते हैं। फिलहाल, रोक लगने से यूजीसी को अपने नियमों पर पुनर्विचार करने और उन्हें अधिक व्यापक बनाने का दबाव बढ़ गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *