जय बदरी विशाल..! भू बैकुंठ धाम बदरीनाथ के कपाट शीतकाल के लिए बंद
चमोली। उत्तराखंड में प्रसिद्ध चारधाम यात्रा का समापन आज औपचारिक रूप से हो गया। इसी क्रम में भू बैकुंठ धाम श्री बदरीनाथ के कपाट भी वैदिक मंत्रोच्चारण और विधि-विधान के साथ शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए। कपाट बंद होने के अवसर पर हजारों श्रद्धालु मौजूद रहे, जिन्होंने “जय बद्रीविशाल” के जयघोषों के बीच दर्शन किए और उसके बाद रावल जी की अगुवाई में शीतकालीन पूजा स्थल जोशीमठ के लिए रवाना हो गए।प्रदेश के मुख्यमंत्री ने श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि बदरीनाथ धाम के कपाट पारंपरिक रीति-रिवाज़ों एवं वैदिक अनुष्ठानों के साथ श्रद्धापूर्वक बंद किए गए। उन्होंने प्रभु बद्रीविशाल से सभी श्रद्धालुओं के सुख-समृद्धि, मंगल और आरोग्य की कामना की।परंपरा के अनुसार अब शीतकाल में कुबेर जी, उद्धव जी और रावल जी पांडुकेश्वर प्रवास पर रहेंगे, जबकि शंकराचार्य जी की गद्दी 27 नवंबर को जोशीमठ पहुंचेगी। मान्यता है कि शीतकाल के दौरान भगवान नारायण तपस्या में लीन रहते हैं और इस अवधि में पूजा-अर्चना का दायित्व देवर्षि नारद संभालते हैं।अगले वर्ष कपाट पुनः खुलने के साथ भक्त एक बार फिर बदरीविशाल के दर्शन कर सकेंगे। इससे पहले सोमवार को बदरीनाथ मंदिर में पंच पूजाओं के तहत माता लक्ष्मी मंदिर में कढ़ाई भोग का आयोजन किया गया। बदरीनाथ के मुख्य पुजारी अमरनाथ नंबूदरी ने माता लक्ष्मी को बदरीनाथ गर्भगृह में विराजमान होने के लिए आमंत्रण दिया। आज मंगलवार को 2 बजकर 56 मिनट पर बदरीनाथ मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिए गए। इस दौरान जय बदरी विशाल की जयकारों से धाम गूंज उठा। हजारों श्रद्धालु कपाट बंद होने के मौके पर मौजूद रहे। मंदिर को करीब दस क्विंटल फूलों से सजाया गया है। 21 नवंबर से बदरीनाथ धाम में पंच पूजाएं शुरू हो गई थीं। गणेश मंदिर, आदि केदारेश्वर व आदि गुरु शंकराचार्य गद्दी स्थल के कपाट बंद होने के बाद मंदिर में वेद ऋचाओं का वाचन भी बंद हो गया है। सोमवार को माता लक्ष्मी मंदिर में विशेष पूजाएं आयोजित की गईं। रावल (मुख्य पुजारी) ने माता लक्ष्मी मंदिर में जाकर उन्हें बदरीनाथ गर्भगृह में विराजमान होने के लिए आमंत्रण दिया। बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलने के बाद छह माह तक माता लक्ष्मी मंदिर परिक्रमा स्थल पर स्थित मंदिर में विराजमान रहती हैं।



