February 13, 2026

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संघर्षों से भरा था “फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट” का राजनीतिक और आंदोलनकारी सफर

राजनीतिक पार्टियों से जुड़े तमाम दिग्गज नेताओं ने भावपूर्ण श्रद्धाजंलि देते हुए उनके योगदान को याद किया
देहरादून। 25 नवम्बर की शाम यूकेडी के वरिष्ठ नेता दिवाकर भट्ट के देहांत की खबर से उत्तराखंड के राजनीतिक हलकों में शोक की लहर व्याप्त हो गई है। राजनीतिक पार्टियों से जुड़े तमाम दिग्गज नेताओं के साथ ही यूकेडी कार्यकर्ताओं ने उनके निधन पर भावपूर्ण श्रद्धाजंलि देते हुए उनके योगदान को याद किया। दिवंगत नेता दिवाकर भट्ट को उत्तराखंड आंदोलन का सबसे जांबाज सिपाही भी माना जाता है। आज उनके निधन से राज्य आंदोलनकारियों की आखों भी नम हो गई। उत्तराखंड फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट का राजनीतिक और आंदोलनकारी सफर संघर्षों से भरा था। 1965 में श्रीनगर में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रताप सिंह नेगी के नेतृत्व में वह पहली बार उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े थे। इसके बाद उनका जीवन लगातार राज्य निर्माण और पहाड़ की समस्याओं के समाधान को समर्पित रहा।संघर्षों से निकले दिवाकर भट्ट को उत्तराखंड फील्ड मार्शल की उपाधि यूं ही नहीं मिली थी। उत्तराखंड के गांधी कहे जाने वाले इंद्रमणि बडोनी ने 1993 में श्रीनगर में हुए उत्तराखंड क्रांति दल के अधिवेशन में उनके तेवर, विचार और आंदोलन के प्रति समर्पण को देखते हुए उन्हें यह सम्मान दिया था। भट्ट के निधन के साथ उत्तराखंड राज्य आंदोलन ने अपना एक सबसे जुझारू सिपाही खो दिया। 1976 में उन्होंने उत्तराखंड युवा मोर्चा का गठन किया। जिसने आगे चलकर पूरी राज्य आंदोलन की दिशा तय की। इसी वर्ष वह बदरीनाथ से दिल्ली तक विशनपाल सिंह परमार, मदन मोहन नौटियाल के नेतृत्व में पदयात्रा में भी शामिल हुए थे। इसके बाद 1980 से वह लगातार तीन बार कीर्तिनगर ब्लॉक प्रमुख बने। उसी वर्ष उन्होंने पहली बार देवप्रयाग विधानसभा से उत्तराखंड क्रांति दल के टिकट पर उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था। दिवाकर भट्ट की आंदोलनकारी तपस्या का एक बड़ा अध्याय श्रीयंत्र टापू आंदोलन (1995) और फिर खैट पर्वत उपवास रहा। 15 सितंबर 1995 को वह 80 वर्षीय सुंदर सिंह के साथ खैट पर्वत की 6 किलोमीटर लंबी खड़ी चढ़ाई तय कर उपवास पर बैठे। खैट पर्वत समुंद्रतल से लगभग 3200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। वहां स्थिति गंभीर होने लगी तो प्रशासन को वहां पहुंचना मुश्किल हो गया था। हालात को देखते हुए 15 दिसंबर 1995 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें दिल्ली वार्ता के लिए बुलाया। दिल्ली में आश्वासन तो मिला, लेकिन समाधान नहीं निकला। इसके बाद वह जंतर-मंतर पर कई दिनों तक उपवास पर बैठे और आंदोलन जारी रखा। 1994 में जुलाई माह में भट्ट ने नैनीताल और पौड़ी में बड़े आंदोलन खड़े किए थे। जिसमें उत्तराखंड राज्य निर्माण, वन कानूनों में संशोधन, पंचायतों का परिसीमन क्षेत्रफल के आधार पर करने, केंद्रीय सेवाओं मेें पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को 2 प्रतिशत आरक्षण लागू करने, पर्वतीय क्षेत्र में जाति के बजाय क्षेत्रफल के आधार पर आरक्षण देने और हिल कैडर को सख्ती से लागू करने की पांच सूत्री मांग प्रमुख थी। तब भट्ट का नारा ‘घेरा डालो-डेरा डालो’ राज्य आंदोलन का स्वर बन गया था। वह अक्सर यह नारा गुनगुनाते थे और युवाओं को संघर्ष के लिए प्रेरित करते थे। 2007 में वह देवप्रयाग विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए और राज्य सरकार में राजस्व एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री बने। मंत्री रहते हुए भी वह हमेशा गांव से पलायन होने को लेकर चिंतित रहते थे। उत्तराखंड के फील्ड मार्शल कहे जाने वाले दिवाकर भट्ट राज्य गठन के वर्षों बाद भी शहीदों और आंदोलनकारियों के सपने पूरे न होने से आहत थे। पूर्व में वह भाजपा का दामन थाम भगवा रंग में भी रंग गए थे। जो भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बने, लेकिन बाद में उनकी उक्रांद में वापसी हो गई थी।
दिवाकर भट्ट को देखते ही गोली मारने का हुआ था मौखिक आदेश
पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत बताते हैं कि राज्य आंदोलनकारी पौड़ी डीएम ऑफिस के पास आमरण अनशन पर थे। इंद्रमणि बडोनी के साथ ही दिवाकर भट्ट व काशी सिंह ऐरी सहित कई लोगों को अनशन स्थल से हटाने के लिए सात अगस्त 1994 की रात पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठियां बरसाई। हंगामे के दौरान कुछ आंदोलनकारी छात्रों ने पुलिस अधीक्षक की जिप्पी फूंक दी। तब पुलिस व प्रशासन की और से दिवाकर भट्ट को देखते ही गोली मारने का मौखिक आदेश हुआ। रावत के मुताबिक तब वह पौड़ी से भाजपा के विधायक थे। उन्हें इसकी जानकारी मिलने पर उन्होंने डीएसपी को बुलाकर बताया कि पुलिस इस तरह का कोई गलत कदम न उठाए।

मुख्यमंत्री धामी ने दिवाकर भट्ट के निधन पर गहरा दु:ख व्यक्त किया
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री श्री दिवाकर भट्ट के निधन पर गहरा दु:ख व्यक्त किया है।
मुख्यमंत्री ने ईश्वर से पुण्यात्मा को श्री चरणों में स्थान देने तथा शोक संतप्त परिजनों को यह असीम दु:ख सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है। मुख्यमंत्री ने अपने शोक संदेश में कहा कि श्री दिवाकर भट्ट के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है, राज्य निर्माण आंदोलन से लेकर जन सेवा के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए कार्य सदैव अविस्मरणीय रहेंगे।
दिवाकर भट्ट उत्तराखंड राज्य निर्माण संघर्ष के पुरोधा थे
पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत ने वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री श्री दिवाकर भट्ट के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड राज्य निर्माण संघर्ष के पुरोधा, जिन्हें आंदोलनकारियों ने फील्ड मार्शल की उपाधि दी, उक्रांद और उत्तराखंडियत की एक बड़ी पहचान, राज्य के पूर्व मंत्री, राज्य निर्माण संघर्ष समिति के अध्यक्ष रहे श्री दिवाकर भट्ट जी के निधन का हृदय विदारक समाचार प्राप्त हुआ। चार-पांच दिन से उनकी रुग्णता की खबर सुन रहा था। मैं उनसे भेंट करना चाहता था, मगर आज-कल में ही रह गया। मैं सोच ही नहीं सकता था कि श्री भट्ट जैसा जुझारू व्यक्ति ऐसे ही चला जाएगा। काश, हम उन्हें दिल्ली या मुंबई में उच्च चिकित्सा सुविधा दिलवाने के लिए ले जा सके होते! कुछ लोगों का व्यक्तित्व इतना संघर्षशील होता है कि हमें हमेशा लगता है, वह बीमारी से लड़कर फिर हमारे मध्य आ जाएंगे। श्री दिवाकर जी के जाने से जन संघर्ष की राजनीति में एक बड़ी रिक्तता पैदा हो गई है। राज्य को उन्हें उनके संघर्ष के लिए “राज्य रत्न पुरस्कार” और भारत सरकार को “पद्मभूषण” देना चाहिए।

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