तराई का ‘वास्तविक संस्थापक’ कौन? छिड़ी गहरी बहस
विधायक तिलक राज बेहड़ ने कहा : पूर्व विधायक राजेश शुक्ला अपने पिता पंडित राम सुमेर शुक्ल को तराई का संस्थापक बताकर सच्चाई को तोड़-मरोड़ रहे

रुद्रपुर। तराई की पहचान, उसके इतिहास और उसकी बसावट को लेकर इन दिनों एक नई बहस जोर पकड़ चुकी है। पंडित राम सुमेर शुक्ल को ‘तराई का संस्थापक’ बताए जाने पर राजनीतिक माहौल अचानक गर्म हो गया है। पूर्व विधायक राजेश शुक्ला और किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ के बीच शब्दों की तकरार अब क्षेत्र की जनता के बीच भी चर्चा का विषय बन गई है। तराई में यह मुद्दा इस कदर फैल चुका है कि अब लोग सवाल पूछने लगे हैं आिखर तराई की असली नींव किसने रखी? कौन है तराई का वास्तविक संस्थापक? विवाद की शुरुआत पंडित राम सुमेर शुक्ल की पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम से हुई, जहां उन्हें ‘तराई का संस्थापक’ बताया गया। इस दावे ने किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ को नाराज कर दिया। कार्यक्रम के पश्चात गुरूवार को श्री बेहड़ ने अपने आवास पर एक प्रेस कांफ्ेस कर तराई के संस्थापक के रूप में पं- रामसुमेर शुक्ल को बताने वाले बयान को अस्वीकार करते हुए कहा कि इतिहास को जानबूझकर बदला जा रहा है और गलत जानकारी फैलाकर जनता को गुमराह किया जा रहा है। बेहड़ का आरोप है कि पूर्व विधायक राजेश शुक्ला अपने पिता पंडित राम सुमेर शुक्ल को तराई का संस्थापक बताकर न केवल सच्चाई को तोड़-मरोड़ रहे हैं बल्कि उन स्वतंत्रता सेनानियों और महापुरुषों का अपमान कर रहे हैं, जिन्होंने तराई को बसाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। विधायक बेहड़ का कहना है कि तराई की बसावट कोई एक व्यक्ति का कार्य नहीं था। उन्होंने दावा किया कि 1947 की आजादी से बहुत पहले ही यहां पर विभिन्न समुदायों के लोग निवास कर रहे थे। उनका कहना है कि भारत स्वतंत्र होने के बाद पाकिस्तान से विस्थापित सिख- पंजाबी परिवारों का पुनर्वास उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर किया गया। इन्हीं प्रयासों के चलते तराई क्षेत्र में 1956 से 1961 के बीच दो हजार से अधिक पंजाबी सिख परिवारों को बसाया गया, जिससे क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक संरचना विकसित होती चली गई। बेहड़ ने यह भी स्पष्ट किया कि तराई को बसाने में अनेक समाजों और वर्गों का योगदान रहा है। पंजाबी, थारू, बुक्सा, पहाड़ी समाज और अन्य स्थानीय समुदायों ने अथक मेहनत से जंगलों को खेतों में बदला और तराई को बसाने में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि ऐसे मेहनतकश लोगों को नजरअंदाज कर एक व्यक्ति को ‘तराई का संस्थापक’ बताना क्षेत्र की जनता का अपमान है और ऐसा प्रयास किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इतिहास के पन्नों का हवाला देते हुए बेहड़ ने कहा कि 1946 में तराई-भाबर कमेटी का गठन किया गया था, जिसमें 31 सदस्य शामिल थे। इस कमेटी के प्रीमियर प्रधान पंडित गोविंद बल्लभ पंत थे, जिन्होंने व्यापक स्तर पर तराई की बसावट और विकास की रूपरेखा तैयार की। पंत ने इस कार्य में पंडित राम सुमेर शुक्ल को भी शामिल किया था और उनका योगदान निस्संदेह महत्वपूर्ण रहा। लेकिन विधायक का तर्क है कि महत्वपूर्ण योगदान को ‘संस्थापक’ कहने का आधार नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा कि तराई के निर्माण में पंत सहित मेजर एचएस संधू, एएन झा, केबी भाटिया, पंडित लक्ष्मण दत्त भट्ट, खान बहादुर, सरवत यार खान सहित कई महापुरुषों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही, जिनके प्रयासों को भुलाया नहीं जा सकता। विधायक बेहड़ ने कहा कि वे स्वयं पंडित राम सुमेर शुक्ल को स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते पूरा सम्मान देते हैं, लेकिन इतिहास को बदलकर पेश करना और तथ्यों को गलत तरीके से प्रचारित करना किसी भी रूप में उचित नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि तराई की स्थापना और इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का विरोध आगे भी जारी रहेगा। राजनीतिक बयानों की इस तेज होती जंग ने तराई के इतिहास को लेकर व्यापक स्तर पर चर्चा छेड़ दी है। क्षेत्र में अब यह सवाल गूंज रहा है कि आिखर तराई की असली नींव किसने रखी? क्या यह राजनीतिक स्वार्थों की वजह से उठा मुद्दा है या क्या अब समय आ गया है कि तराई के इतिहास को नए नजरिए से समझा जाए? यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराने की पूरी संभावना है, जो न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक रूप से भी असर दिखाएगा।
