किच्छा नगर पालिका चुनाव में शुक्ला के ओवर कॉन्फिडेंस से बढ़ा भाजपा की हार का अंतर
अग्रवाल और पंजाबी समाज की नाराजगी से लेकर कमजोर चुनावी मैनेजमेंट तक कई कारणों की हो रही चर्चा
किच्छा। नगर पालिका चुनाव का परिणाम भले ही एक स्थानीय निकाय का फैसला हो लेकिन किच्छा की राजनीति में इसके दूरगामी मायने निकाले जा रहे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह ने भाजपा के संदीप अरोड़ा को 6147 मतों के बड़े अंतर से हराकर अध्यक्ष पद पर कब्जा किया। वहीं किच्छा से अलग होकर पहली बार अस्तित्व में आई सिरौलीकलां नगर पालिका में कांग्रेस की राशिदा ने 1773 मतों से जीत दर्ज की और चारों वार्डों में भी कांग्रेस प्रत्याशियों ने जीत हासिल कर क्लीन स्वीप किया। इन नतीजों के बाद भाजपा के चुनावी प्रबंधन और खास तौर पर पूर्व विधायक राजेश शुक्ला की रणनीति पर सवाल उठने लाज़िमी है।
दरअसल चुनाव प्रबंधन किसी भी चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। प्रत्याशी कितना मजबूत है संगठन कितना बड़ा है और पार्टी के पास कितने संसाधन हैं यह सब तभी परिणाम में बदलता है जब इनका व्यवस्थित तरीके से इस्तेमाल हो। किच्छा नगर पालिका चुनाव में भाजपा के सामने यही सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ है कि क्या चुनाव का पूरा मैनेजमेंट संगठन के माध्यम से और एक व्यवस्थित सिस्टम के तहत चलाया गया या फिर पूरी चुनावी कमान एक ही राजनीतिक चेहरे के इर्द-गिर्द सिमट गई। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोरा की चुनावी कमान पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने संभाली। चुनाव प्रचार से लेकर जनसंपर्क और राजनीतिक हमलों तक शुक्ला की सक्रियता प्रमुख रूप से दिखाई दी। चुनाव के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह के पक्ष में विधायक तिलक राज बेहड़ और भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोरा के पक्ष में पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के सक्रिय रहने से मुकाबला धीरे-धीरे स्थानीय निकाय चुनाव से आगे बढ़कर दोनों नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा का मुकाबला भी बन गया।
यहीं से भाजपा के चुनावी मैनेजमेंट पर सवाल शुरू होते हैं। स्थानीय राजनीतिक आकलन यह है कि पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने चुनाव को संदीप अरोरा के स्थानीय चेहरे और नगर पालिका के मुद्दों पर केंद्रित करने के बजाय अपनी राजनीतिक लड़ाई के चश्मे से देखा। चुनाव के दौरान कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ और प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह पर लगातार हमले होते रहे और मुकाबला व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की दिशा में चला गया। यदि चुनाव को स्थानीय मुद्दों विकास और संदीप अरोरा की व्यक्तिगत स्वीकार्यता के आधार पर आगे बढ़ाया जाता तो भाजपा के लिए मुकाबले का स्वरूप अलग हो सकता था।
राजेश शुक्ला का राजनीतिक अनुभव लंबा रहा है। वह किच्छा से दो बार विधायक रह चुके हैं और 2017 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को हराकर बड़ी राजनीतिक जीत दर्ज कर चुके हैं। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्हें कांग्रेस के तिलक राज बेहड़ से हार का सामना करना पड़ा। अब निकाय चुनाव में भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोरा की हार के बाद एक बार फिर शुक्ला की चुनावी रणनीति पर चर्चा हो रही है। खासकर इसलिए क्योंकि इस बार भी भाजपा प्रत्याशी की चुनावी कमान शुक्ला के हाथ में थी और परिणाम में कांग्रेस की बढ़त पहले चक्र से लेकर अंतिम चक्र तक बनी रही। किच्छा में राजेश प्रताप सिंह को 19091 वोट मिले जबकि संदीप अरोड़ा को 12944 वोट प्राप्त हुए। पहले चक्र में ही कांग्रेस प्रत्याशी ने 1702 वोट की बढ़त बना ली थी। तीसरे चक्र में यह बढ़त 2126 वोट रही और चारों चक्रों की गिनती पूरी होने के बाद अंतर 6147 वोट तक पहुंच गया। यानी भाजपा प्रत्याशी को केवल अंतिम दौर में नुकसान नहीं हुआ बल्कि पूरे चुनावी परिणाम में कांग्रेस लगातार आगे रही। टिकट वितरण का सवाल भी भाजपा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पूर्व पालिका अध्यक्ष स्वर्गीय सुरेश अग्रवाल के पुत्र दिव्यांशु अग्रवाल को भाजपा ने वार्ड सभासद पद का टिकट नहीं दिया। इसके बाद दिव्यांशु अग्रवाल वार्ड नंबर 12 से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे और जीत हासिल की।
यहीं से अग्रवाल समाज की नाराजगी का मुद्दा भी चुनावी चर्चा में आया। स्थानीय स्तर यह सवाल उठा कि यदि भाजपा अग्रवाल समाज की दावेदारी को गंभीरता से लेते हुए दिव्यांशु अग्रवाल को वार्ड सभासद पद के लिए प्रत्याशी बनाती तो क्या समाज का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा होता। यह कहना संभव नहीं है कि टिकट बदलने से चुनाव परिणाम निश्चित रूप से बदल जाता लेकिन वार्ड 12 में दिव्यांशु अग्रवाल की निर्दलीय जीत ने भाजपा के टिकट वितरण पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया। स्थानीय राजनीतिक चर्चा में यह भी कहा जा रहा है कि दिव्यांशु अग्रवाल के कांग्रेस से तालमेल और उनके प्रभाव वाले वार्ड में कांग्रेस प्रत्याशी के हटने के बाद अग्रवाल समाज का एक हिस्सा अध्यक्ष पद के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की ओर चला गया। यदि भाजपा समय रहते इस नाराजगी को साध लेती और समाज के प्रभावशाली लोगों को अपने साथ जोड़ लेती तो अध्यक्ष पद के चुनाव में उसे इसका लाभ मिल सकता था।
इसी तरह पंजाबी समाज के समीकरण भी भाजपा के पक्ष में पूरी तरह नहीं जा सके। भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोरा पंजाबी समाज से आते हैं लेकिन स्थानीय राजनीतिक चर्चा के अनुसार समाज के एक हिस्से में पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के गुट को लेकर पहले से नाराजगी थी। यही कारण रहा कि प्रत्याशी पंजाबी होने के बावजूद समाज का समर्थन एकतरफा तरीके से भाजपा के पक्ष में नहीं गया। भाजपा के लिए एक और चुनौती पार्टी के भीतर संदीप अरोरा को लेकर सर्वमान्य स्वीकार्यता का सवाल रहा। स्थानीय स्तर पर भाजपा के भीतर अलग-अलग धड़ों और प्रभावशाली नेताओं के बीच तालमेल कितना रहा यह चुनाव परिणाम के बाद चर्चा का विषय है। यदि पार्टी प्रत्याशी को संगठन का सर्वमान्य चेहरा बनाकर सभी गुटों और स्थानीय दावेदारों को साथ लेकर चलती तो चुनावी मैदान में संगठन की सामूहिक ताकत अलग तरीके से दिखाई दे सकती थी।
किच्छा की राजनीति में पूर्व विधायक राजेश शुक्ला से जुड़े असंतोष की चर्चा भी नई नहीं है। इस चुनाव में यदि संगठन के स्तर पर सभी स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चुनाव लड़ा जाता और प्रत्याशी के नेतृत्व में बूथ स्तर तक जिम्मेदारियां बांटी जातीं तो भाजपा को इसका लाभ मिल सकता था। इसके विपरीत चुनाव की पूरी कमान एक प्रमुख चेहरे के हाथ में केंद्रित होने से संगठन की सामूहिक भूमिका उतनी प्रभावी दिखाई नहीं दी जितनी एक नगर पालिका चुनाव में अपेक्षित होती है। चुनाव का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू किच्छा से सिरौलीकलां को अलग नगर पालिका बनाए जाने से जुड़ा है। स्थानीय राजनीतिक चर्चा में लंबे समय से यह माना जाता रहा कि सिरौलीकलां को अलग निकाय बनाए जाने से किच्छा के मतों का सामाजिक समीकरण बदलेगा और इसका भाजपा को लाभ मिल सकता है। लेकिन चुनाव परिणाम ने ऐसा कोई सीधा लाभ नहीं दिखाया। किच्छा में कांग्रेस ने 6147 वोटों से जीत दर्ज की जबकि सिरौलीकलां में कांग्रेस की राशिदा ने 1773 वोटों से अध्यक्ष पद जीता और चारों वार्डों में कांग्रेस प्रत्याशी विजयी रहे। सिरौलीकलां में राशिदा को 5434 वोट मिले जबकि निर्दलीय फरीन जहां को 3661 वोट प्राप्त हुए। चारों वार्डों में राशिदा को बढ़त मिली। मंडी वार्ड में उनकी बढ़त 788 वोट रही जबकि इंदिरा नगर में 729 वोट की बढ़त मिली। 4 बीघा वार्ड में 439 और पंचायत घर वार्ड में 183 वोट की बढ़त मिली। यही चारों वार्डों की बढ़त अध्यक्ष पद के परिणाम में कांग्रेस के पक्ष में निर्णायक साबित हुई। सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि भाजपा की हार का अंतर इतना बड़ा क्यों हुआ। एक चुनाव में हार और जीत के कई कारण होते हैं लेकिन किच्छा के परिणाम को देखें तो टिकट वितरण से पैदा हुई नाराजगी संगठन के भीतर तालमेल की कमी,स्थानीय सामाजिक समीकरण कमजोर और मैनेजमेंट के साथ राजनीतिक टकराव में बदल देना ऐसे बिंदु हैं जिन पर भाजपा को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। अब भाजपा के सामने सवाल केवल हार का नहीं बल्कि यह भी है कि चुनावी व्यवस्था में कहां ऐसी कमी रह गई जिसके कारण 6147 वोटों का अंतर खड़ा हो गया। किच्छा का यह परिणाम आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले स्थानीय भाजपा संगठन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत जरूर है। हालांकि निकाय चुनाव के परिणाम को सीधे विधानसभा चुनाव का पैमाना मानना जल्दबाजी होगी लेकिन लगातार दूसरे चुनाव में कांग्रेस के हाथों हार के बाद किच्छा में भाजपा की रणनीति संगठनात्मक तालमेल और स्थानीय सामाजिक समीकरणों पर नए सिरे से चर्चा होना बहुत ज़रूरी है।


