कैंची धाम के जाम ने बढ़ाई पहाड़ की मुश्किलें : आखिर कब बनेगा ठोस एक्शन प्लान? हजारों स्थानीय यात्रियों को घंटों सड़क पर फंसे रहना पड़ रहा
आखिर कब बनेगा ठोस एक्शन प्लान? सोशल मीडिया पर प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल
हल्द्वानी/नैनीताल। वीकेंड के चलते उत्तराखंड की सड़कों पर बढ़ा ट्रैफिक अब लोगों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन गया है। नैनीताल और कैंची धाम की ओर उमड़ी पर्यटकों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बीच मुख्य मार्गों पर लंबा जाम लगने से पहाड़ से आने-जाने वाले हजारों यात्रियों को घंटों सड़क पर फंसे रहना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा असर कैंची धाम क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर, कर्णप्रयाग, गैरसैंण, पौड़ी गढ़वाल और रुद्रप्रयाग समेत विशाल पर्वतीय क्षेत्र के हजारों गांवों को हल्द्वानी, अस्पतालों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशन से जोड़ने वाले इस प्रमुख मार्ग पर पिछले दो दिनों से यातायात बुरी तरह प्रभावित है। कई यात्रियों के अनुसार करीब 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में तीन से चार घंटे तक का समय लग रहा है। जाम को लेकर सोशल मीडिया पर भी लोगों का आक्रोश देखने को मिल रहा है।
आठ घंटे तक खिंचा हल्द्वानी-अल्मोड़ा सफर
सामान्य दिनों में हल्द्वानी से अल्मोड़ा पहुंचने में करीब तीन घंटे लगते हैं, लेकिन जाम के कारण यात्रियों को इसी दूरी के लिए करीब आठ घंटे तक सड़क पर रहना पड़ा। नैनीताल में भी कई किलोमीटर लंबा जाम और होटलों में भारी भीड़ की सूचना सामने आई है। मसूरी और ऋषिकेश में भी पर्यटकों की बढ़ी आमद के कारण यातायात प्रभावित हुआ है।जाम का असर केवल पर्यटकों तक सीमित नहीं है। पहाड़ से अस्पतालों की ओर ले जाए जा रहे मरीजों, नौकरी-पेशा लोगों, विद्यार्थियों और जरूरी काम से यात्रा करने वाले स्थानीय लोगों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। लंबे समय तक वाहन में फंसे यात्रियों को खाने-पीने तक की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं बस और ट्रेन पकड़ने वाले यात्रियों के साथ-साथ हवाई यात्रा करने वालों की कनेक्टिंग यात्रा भी प्रभावित हो रही है।
विशेष ट्रैफिक प्लान लागू, लेकिन सवाल कायम
दो अक्टूबर की छुट्टी और वीकेंड को देखते हुए पुलिस ने 2 से 4 अक्टूबर तक कैंची धाम, भवाली और भीमताल क्षेत्र के लिए विशेष ट्रैफिक प्लान और डायवर्जन लागू किया है। भीड़ बढ़ने पर पार्किंग में वाहनों को रोकने और शटल सेवा संचालित करने जैसे कदम तत्काल राहत दे सकते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसी व्यवस्थाएं केवल भीड़ बढ़ने के बाद लागू करने के बजाय स्थायी यातायात रणनीति का हिस्सा बनाई गई हैं? यदि किसी विशेष दिन हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आने की संभावना पहले से रहती है, तो पार्किंग क्षमता, शटल रूट, वैकल्पिक मार्ग, ट्रैफिक डायवर्जन, आपातकालीन लेन और यातायात नियंत्रण की व्यवस्था पहले से कितनी तैयार है—इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पर्यटक परेशान, स्थानीय भी हलकान
जाम का असर सिर्फ बाहर से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं पर नहीं पड़ता। पहाड़ के स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी इससे प्रभावित होती है। मरीज अस्पताल पहुंचने में देर कर सकते हैं, कर्मचारी और विद्यार्थी समय पर अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पाते और जरूरी पारिवारिक कार्यों के लिए निकलने वाले लोगों की पूरी दिनचर्या बिगड़ जाती है। यही कारण है कि पर्वतीय क्षेत्रों के यातायात संकट को महज “वीकेंड की भीड़” कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पर्यटन और धार्मिक पर्यटन बढ़ रहा है तो उसके अनुरूप यातायात व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।
आखिर कब बनेगा ठोस एक्शन प्लान? सोशल मीडिया पर प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल
जाम को लेकर सोशल मीडिया पर भी लोगों का आक्रोश देखने को मिल रहा है। लोगों ने यातायात व्यवस्था के साथ-साथ स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन की तैयारियों और कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि कैंची धाम जैसे प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थल पर छुट्टियों और वीकेंड में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना पहले से रहती है। ऐसे में ट्रैफिक का दबाव अचानक पैदा होने वाली स्थिति नहीं है।सोशल मीडिया पर लोगों का सवाल है कि जब भीड़ और वाहनों की संख्या बढ़ने का अनुमान पहले से रहता है, तो यातायात प्रबंधन के लिए स्थायी और प्रभावी कार्ययोजना क्यों नहीं बनाई जाती?ह र बार भीड़ बढ़ने के बाद डायवर्जन, पार्किंग और शटल सेवा जैसे इंतजाम किए जाते हैं। लेकिन कुछ समय बाद स्थिति सामान्य होते ही व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या केवल मौके पर पुलिस बल तैनात करना ही पर्याप्त समाधान है?
पर्यटन बढ़ रहा है तो ट्रैफिक प्लान भी बढ़ना चाहिए
उत्तराखंड में पर्यटन और धार्मिक पर्यटन तेजी से महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि बन चुके हैं। कैंची धाम जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों की लोकप्रियता के साथ यहां आने वाले श्रद्धालुओं और वाहनों की संख्या भी बढ़ रही है। ऐसे में चुनौती केवल सड़कों को चौड़ा करने की नहीं, बल्कि पूरे यातायात तंत्र को बढ़ती मांग के अनुरूप तैयार करने की है।हर बार छुट्टियों में जाम लगता है, यात्री घंटों फंसते हैं, पुलिस व्यवस्था संभालती है और पार्किंग व शटल सेवा जैसे अस्थायी उपाय किए जाते हैं। कुछ समय बाद यातायात सामान्य हो जाता है, लेकिन अगली छुट्टी आते ही हालात फिर उसी स्थिति में पहुंच जाते हैं।
10 साल के रियांशु की मौत ने बढ़ाई चिंता
इसी बीच पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क और यातायात व्यवस्था के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीर तस्वीर भी सामने आई है। जानकारी के अनुसार आज शाम एक गांव में अपनी दादी के साथ आंगन में खेल रहे 10 वर्षीय रियांशु को गुलदार उठा ले गया। ग्रामीणों ने अंधेरे में झाड़ियों से बच्चे का शव बरामद किया। यह घटना पहाड़ों में लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाती है। एक ओर लोग जाम और खराब यातायात व्यवस्था से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई पर्वतीय गांवों में वन्यजीवों का खतरा भी लगातार बना हुआ है।

