February 11, 2026

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तो अब खुला घूमेंगे गुनाहगार!! मुजफ्फरनगर कांड की याचिका निस्तारित

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य आंदोलनकारियों के मामले में स्वतः सज्ञान लेने से सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई करने के बाद इसे निस्तारित कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने यह कहा है कि यह मामला उत्तर प्रदेश के मुज्जफरनगर से जुड़ा है। इसलिए मामला उत्तर प्रदेश में दायर किया जाए। उल्लेखनीय है कि पूर्व में उच्च न्यायालय ने सरकार से इस मामले में जवाब पेश करने को कहा था। सोमवार को न्यायालय के आदेश पर उत्तराखंड सरकार की ओर से शपथ पत्र पेश किया गया जिसमें कहा गया कि यह मामला 1994 का है। तब उत्तराखंड यूपी से अलग नहीं हुआ था। उत्तराखंड सरकार के द्वारा सभी पीड़ितों को उचित मुआवजा व पेंशन दी जा रही है। यदि कोई पीड़ित छूट गया है तो वह उत्तर प्रदेश सरकार के सामने अपने पक्ष रखे क्योंकि यह मामला उत्तर प्रदेश से जुड़ा है और इसका न्यायिक क्षेत्र भी उत्तर प्रदेश में ही है। पूर्व में न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को मामले में पक्षकार बनाते हुए उनसे पूछा था कि मुज्जफरनगर कांड में जिम्मेदार पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियो पर क्या कार्रवाई हुई और तमाम अदालतों में मुजफरनगर कांड से संबंधित मुकदमों का स्थिति क्या है और उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा था। उत्तराखंड राज्य की अलग माँग को लेकर पूरे प्रदेश के आंदोलनकारी 2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली में विशाल प्रदर्शन के लिए कूच कर रहे थे। इसी दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने आंदोलनकारियों को दिल्ली जाने से रोकने के आदेश दिए और पुलिस ने तत्कालीन सरकार के आदेश पर एक अक्टूबर की रात को सभी आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर रोक लिया। रोके जाने से आंदोलनकारी नाराज हुए तो पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर फायरिंग कर दी, जिसमें दर्जन भर पुरु ष और महिला आंदोलनकारी शहीद हुए और सैकड़ों आंदोलनकारी घायल हो गए थे। साथ ही आंदोलन में दिल्ली जा रही महिला आंदोलनकारियों के साथ दुष्कर्म भी किया गया। मुजफ्फरनगर कांड में पीड़ितों को अब तक न्याय न मिलने व फायरिंग के आरोपितों पर कार्रवाई नहीं होने पर उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने 5 अक्टूवर 2018 को एक समाचार पत्र में छपी खबर का जनहित याचिका के रूप में स्वतः सज्ञान लिया था और मामले को ‘‘इन द मैटर आफ डिमांड आफ जस्टिस फॉर प्रो स्टेटहुड पीपुल’ के नाम से जनहित याचिका दर्ज की थी। याचिका में कहा गया था कि अभी तक आरोपियों को सजा नहीं मिल पाई है। अधिकांश आरोपी अदालतों से बरी हो चुके हैं, यहां तक कि इनकी फाइलें भी न्यायालयों से गायब हो चुकी हैं।

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