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जब स्कूल ही नहीं बचेंगे,तो ‘कैसे पढ़ेगा उत्तराखंड’? पिछले पांच सालों में बंद हुए उत्तराखंड के 826 प्राथमिक विद्यालय

नए शिक्षण सत्र के आगाज पर सामने आई विचलित करने वाली रिपोर्ट
रुद्रपुर। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रें में सरकारी शिक्षा व्यवस्था के हालत साल- दर- साल बदतर होती जा रही है। एक तरफ राज्य में नए शिक्षण सत्र का आगाज होने को है, दूसरी ओर यह प्रश्न और भी बड़ा होता जा रहा है कि राज्य के शासकीय प्राथमिक विद्यालयों पर छात्रें एवं अभिभावकों का भरोसा दोबारा बहाल करने के गंभीर प्रयास कब आरंभ होंगे, क्योंकि उत्तराखंड के प्राथमिक विद्यालय छात्रें के अभाव में लगातार बंद होते जा रहे हैं। हाल ही में संपन्न उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान एक प्रश्न के जवाब में प्रदेश के शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत द्वारा बताया गया है कि राज्य में पिछले करीब पांच वर्षों के दौरान 826 प्राथमिक विद्यालयों पर ताले लग चुके हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि राज्य जब में स्कूल ही नहीं बचेंगे तो कैसे पढ़ेगा उत्तराखंड? इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि कभी जिन गांवों के स्कूल बच्चों की चहल पहल से गुलजार रहते थे, आज वहां सन्नाटा पसरा हुआ है। कई स्कूलों में छात्रें की संख्या इतनी कम रह गई कि उन्हें चलाना मुश्किल हो गया है। यही कारण है कि शिक्षा विभाग को इन स्कूलों को बंद करने या नजदीकी विद्यालयों में समायोजित करने का फैसला लेना पड़ा। हालांकि स्कूल बंद होने की समस्या का असर पूरे राज्य में एक जैसा नहीं है, लेकिन कुछ जिलों में यह स्थिति ज्यादा गंभीर दिखाई दे रही है। विधानसभा में रखे गए आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक स्कूल टिहरी जिले में बंद हुए हैं। यहां 262 स्कूल बंद कर दिए गए हैं। उसके बाद नंबर आता है पौड़ी गढ़वाल जिले का, जहां 120 स्कूल बंद किए गए हैं। तीसरे नंबर पर पिथौरागढ़ जिला है, जहां 104 स्कूल बंद हुए हैं। वहीं, अन्य जिलों जिलों की स्थिति पर नजर डालें तो अल्मोड़ा में 83, नैनीताल में 49, चमोली में 43, देहरादून में 38, चंपावत जिले में 34, उत्तरकाशी में 25, उधमसिंह नगर में 21, रुद्रप्रयाग में 15 , बागेश्वर में 25 तथा हरिद्वार में 2 स्कूलों पर ताले लग चुके हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि पहाड़ी जिलों में स्कूलों के बंद होने की समस्या ज्यादा देखने को मिल रही है। इसका मुख्य कारण इन इलाकों से लगातार हो रहा पलायन और घटती आबादी है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रें में पलायन लंबे समय से एक बड़ी सामाजिक समस्या रहा है। इसका सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ा है। रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और आधुनिक जीवन की तलाश में हजारों परिवार हर साल गांवों से शहरों की ओर जा रहे हैं। जब परिवार गांव छोड़ देते हैं तो स्वाभाविक रूप से बच्चों की संख्या भी कम हो जाती है।बुनियादी सुविधाओं की शिक्षावद् शिव शंकर जायसवाल के अनुसार स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी छात्रें की संख्या घटने का एक महत्वपूर्ण कारण है। कई विद्यालयों के भवन जर्जर हालत में हैं। वहां पर्याप्त कक्षाएं नहीं हैं। कुछ स्कूलों में शौचालय, पेयजल और खेल मैदान जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे हालात में अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने से हिचकते हैं और निजी स्कूलों को बेहतर विकल्प मानते हैं। यही वजह है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन लगातार घटता जा रहा है। इसके अलावा सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी भी लंबे समय से एक बड़ी समस्या है। स्कूल मिलकर  उत्तराखंड में पांच वर्षों के भीतर 826 प्राथमिक स्कूलों का बंद होना एक गंभीर संकेत है। यह स्थिति बताती है कि पहाड़ों में शिक्षा व्यवस्था कई चुनौतियों से जूझ रही है। पलायन, घटती छात्र संख्या, बुनियादी सुविधाओं की कमी और शिक्षकों की समस्या जैसे कई कारण मिलकर इस संकट को और गहरा बना रहे हैं। जाहिर है कि अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और भी गंभीर हो सकती है।

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