लूम्स ऑफ नीति-माणा से आत्मनिर्भर बनेंगी चमोली की महिलाएं
चमोली । जिले के नीति-माणा क्षेत्र की महिलाओं और चरवाहा समुदाय की पीढ़ियों पुरानी ऊन बुनाई की कला को अब नई पहचान मिलने जा रही है। मोटी पंखी, लोई, थुलमा और चुटका जैसे पारंपरिक ऊनी वस्त्र, जो कभी हिमालयी क्षेत्र की पहचान और आजीविका का मुख्य साधन थे, उन्हें ‘लूम्स ऑफ नीति-माणा’ के माध्यम से पुनर्जीवित किया जा रहा है। समय के साथ बाजार में सस्ते ऐक्रेलिक धागों के बढ़ते चलन ने स्थानीय महिलाओं की मेहनत को कम दाम तक सीमित कर दिया था, लेकिन अब इस नई पहल से महिलाएं सीधे बाजार से जुड़कर अपनी कला का उचित मूल्य प्राप्त करेंगी।लूम्स ऑफ नीति-माणा का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को केवल श्रमिक न बनाकर उन्हें उत्पाद का मालिक बनाना है। इसके तहत पालसी भेड़ों की स्वदेशी ऊन और भांग आधारित प्रीमियम उत्पाद विकसित किए जा रहे हैं। गांवों में उत्पादक सहकारी संस्थाएं बनाई जा रही हैं, ताकि महिलाएं और कारीगर स्वयं यह तय कर सकें कि बाजार की मांग के अनुरूप क्या बनाना है और उसका मूल्य क्या होगा। लूम्स ऑफ लद्दाख की संस्थापक अभिलाषा बहुगुणा ने बताया कि लद्दाख में यह प्रयोग बेहद सफल रहा है, जहां स्थानीय ऊन और नए डिजाइनों के मेल से महिलाओं की आय में कई गुना वृ(ि हुई है। इसी मॉडल को अब नीति-माणा में लागू कर यहां की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है।हाल ही में दिल्ली में आयोजित एक प्रदर्शनी के दौरान इस पहल को बड़ी सफलता मिली, जहां नीति-माणा सहकारी के सदस्यों द्वारा तैयार स्वदेशी ऊन के उत्पादों को ग्राहकों ने हाथों-हाथ लिया। प्रीमियम कीमतों पर बिके इन उत्पादों ने स्थानीय महिलाओं के आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक ;नाबार्डद्ध चमोली के जिला विकास प्रबंधक श्रेयांश जोशी ने बताया कि यदि कारीगर बाजार की मांग के अनुसार हस्तकरघा के उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाएंगे, तो निश्चित रूप से उनकी आजीविका में बड़ा सुधार आएगा। उन्होंने कहा कि नाबार्ड स्थानीय लोगों को आत्मनिर्भर बनाने में निरंतर सहयोग कर रहा है।इस पूरी व्यवस्था को सुदृढ़ करने में मानव सेवा समिति के महेश खंकरियाल और नीति-माणा सहकारी समिति के निर्वाचित सदस्य कुंदन सिंह टकोला, नंदी राणा, किशोर बडवाल और नरेंद्र राणा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इस अभियान के माध्यम से अब महिलाएं सस्ते धागों के जाल से निकलकर अपनी पहचान और उत्पादों की मालिक खुद बन रही हैं। यह पहल चमोली के सीमांत क्षेत्रों में सम्मानजनक और टिकाऊ आजीविका की एक नई दिशा तय कर रही है।
