January 22, 2026

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उत्तराखंड के सांसद यूपी-हरियाणा में लुटा रहे हैं सांसद निधि?

देहरादून। उत्तराखंड की जनता ने जिन सांसदों को विकास की उम्मीदों के साथ संसद भेजा, वही सांसद अब अपने ही राज्य की बजाय दूसरे राज्यों के हालात सुधारने में जुटे नजर आ रहे हैं। आरटीआई के जरिए सामने आए दस्तावेजों में इसका खुलासा हुआ है। आरटीआई में हुए खुलासे के मुताबिक उत्तराखंड के सांसदों ने अपनी सांसद निधि से करीब 1.28 करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश और हरियाणा में विभिन्न विकास कार्यों के लिए खर्च किए हैं। इन कार्यों में टड्ढूबवेल लगवाना, स्कूल निर्माण, सामुदायिक भवन और जल निकासी जैसे काम शामिल हैं। यह सब ऐसे समय में सामने आया है, जब उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का हाल किसी से छिपा नहीं है। कई गांवों में आज भी महिलाओं को पीने के साफ पानी के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है। अनेक स्कूल जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति लगातार सवालों के घेरे में रहती है। आरटीआई दस्तावेजों के अनुसार इस दरियादिली में सबसे आगे हैं टिहरी गढ़वाल की सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह। वित्तीय वर्ष 2024-25 में उन्होंने अकेले उत्तर प्रदेश में फुटपाथ, पैदल मार्ग और पेयजल से जुड़े कार्यों के लिए करीब एक करोड़ रुपये की सांसद निधि खर्च की है। वहीं टिहरी के कई गांव आज भी सड़क और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं। वहीं दूसरे नंबर पर हैं राज्यसभा सांसद नरेश बंसल। बंसल ने हरियाणा में स्कूल, कॉलेज और सामुदायिक भवनों के निर्माण के लिए 25 लाख रुपये की निधि दी है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड के स्कूलों और कॉलेजों की हालत इतनी बेहतर हो चुकी है कि बाहर के राज्यों को प्राथमिकता दी जा रही है? पूरे मामले पर सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह का पक्ष भी सामने आया है। उनका कहना है कि उत्तराखंड के लोग पूरे देश में रहते हैं और कुछ लोग व्यक्तिगत जरूरतों को लेकर उनके पास पहुंचे थे, इसलिए कुछ कार्यों को मंजूरी दी गई। साथ ही उन्होंने दावा किया कि टिहरी का विकास उनकी प्राथमिकता है और सांसद निधि का अधिकांश हिस्सा वहीं खर्च किया जाता है। कानूनी तौर पर देखें तो यह कदम पूरी तरह नियमों के खिलाफ नहीं है। अगस्त 2024 में केंद्र सरकार द्वारा सांसद निधि के नियमों में बदलाव किया गया, जिसके तहत अब कोई भी सांसद देश में कहीं भी अपनी निधि खर्च कर सकता है। लेकिन सवाल नियमों से बड़ा है। सवाल प्राथमिकताओं का है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड के पहाड़ों की सारी जरूरतें पूरी हो चुकी हैं? क्या उत्तर प्रदेश और हरियाणा के सांसदों की निधि कम पड़ रही है, जो उत्तराखंड के सांसदों को वहां पैसा भेजना पड़ रहा है?

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