February 11, 2026

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विरासत महोत्सव मे सांस्कृतिक धारोहर और शास्त्रीय संगीत की भव्य प्रस्तुति रही यादगार

देहरादून।देहरादून में चल रहे विरासत महोत्सव 2025 के तीसरे दिन का आयोजन भारतीय संस्कृति की गरिमा, लोककला की विविधता और शास्त्रीय संगीत की गूंज के साथ ऐतिहासिक बन गया। विरासत साधना की सुबह जहां देशभर के विद्यालयों के छात्रों की रंगारंग प्रस्तुतियों से गुलजार रही, वहीं शाम को अंतरराष्ट्रीय लोक कलाकारों और भारतीय शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।सुबह की शुरुआत विरासत साधना से हुई, जिसमें विभिन्न स्कूलों के विद्यार्थियों ने नृत्य और संगीत प्रतियोगिताओं में भाग लिया। खासकर बालिकाओं की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को अभिभूत कर दिया। सानिका बर्थवाल ने ‘बरसन लागी बदरिया…’ पर अपनी नृत्य प्रस्तुति से मंच पर समां बांध दिया। इसके बाद प्रणिका झिल्डियाल ;सेंट जोजेफ एकेडमी, समीक्षा नेगी ;हैरिटेज स्कूल, प्रकिता जखमोला ;डुमरी एडुविला इंस्टीट्यूट, एशवेन नेगी ;वेनहेल स्कूलद्ध, आकृति मैठाणी ;सोशल बलूनी पब्लिक स्कूलद्ध, साहनवी बिजल्वाण व देवयाना कोठियाल ;सेंट कबीर स्कूलद्ध, ध्रुव वर्मा ;जीआईसी नथुवावाला और तेजल त्यागी ;न्यू ब्लूसूम स्कूल ने मंच पर बेहतरीन प्रस्तुतियाँ दीं। एरिका रोज पिंटू ;सेंट पेट्रिक स्कूल ने श्सब सरकार तुम्हई से है…नृत्य कर दर्शकों का मन मोह लिया। अस्मिता खेत्रपाल, शेम्या अग्रवाल, आराध्या बहुगुणा, स्वर्ण शिखा खंडूड़ी, अक्षिता राव और ओजस्वी कुनवाल की प्रस्तुतियाँ भी खूब सराही गईं। प्रतिभागियों को स्मृति चिन्ह और प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। शाम की सांस्कृतिक संध्या का आरंभ उज्बेकिस्तान के प्रतिष्ठित म्यूजिकल ग्रुप की शानदार प्रस्तुतियों से हुआ। फोतिमाबोनू उमरोवा ;मुख्य कोरियोग्राफर, लोला चोलिबोयेवा और रुशाना ओक्टामोवा की लोकनृत्य प्रस्तुतियाँ अत्यंत मोहक रहीं। साथ ही, गायक फैक्सरिद्दीन जोलनाजरोव, इब्रोहिम उर्चिनोव और शाक्सजोद योल्दाशेव ने पारंपरिक ‘कठ्ठा अशुला’ गायन शैली में बिना वाद्ययंत्रों के प्रस्तुति देकर दर्शकों को झूमने पर विवश कर दिया। लोक गायन ‘लड़की हसीन हो… लड़का जवान हो…’ ने दर्शकों में विशेष उत्साह भर दिया, जबकि ‘हिरोसिम अजगी’ की भावपूर्ण प्रस्तुति ने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। उनकी प्रस्तुतियों ने भारत- उज्बेकिस्तान सांस्कृतिक संबंधों को और भी प्रगाढ़ बना दिया।शाम का आकर्षण बने देश के प्रसिद्ध युवा सरोद वादक प्रतीक श्रीवास्तव, जिन्होंने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत राग श्याम कल्याण से की और राग मेघ में समापन किया। उनके साथ तबले पर संगत कर रहे शुभ महाराज के साथ उनकी जुगलबंदी ने संगीत प्रेमियों को भावविभोर कर दिया। शाम की अंतिम प्रस्तुति में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गज, पप्रश्री पं. उल्हास कशालकर ने जब मंच संभाला, तो मौसम भी उनका स्वागत करने के लिए थम गया। उन्होंने राग संपूर्ण मालकौंस में दो पारंपरिक बंदिशें प्रस्तुत कर माहौल को सुरमय बना दिया। उनकी संगत में थे हारमोनियम पर डॉ. विनय मिश्रा, तबले पर कौस्तुव स्वैन, तानपुरा पर अंशुमान भट्टठ्ठाचार्य, तथा स्वर-संगत में प्रो. ओजेश प्रताप सिंह। ग्वालियर, जयपुर और आगरा घरानों से प्रशिक्षित पं. कशालकर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन पुरस्कार व पं. ओंकारनाथ ठाकुर पुरस्कार जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है। वे वर्तमान में आईटीसी संगीत अनुसंधान अकादमी से जुड़े हुए हैं।

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