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कांग्रेस पार्टी में भीतर खाने ‘नफरत की दुकान’

(अर्श) रूद्रपुर। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछले काफी समय से पिछले से न सिर्फ समूचे भारत बल्कि विदेशों में भी यह एक जुमला बार-बार दोहराते रहे हैं कि ‘मैं नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने निकला हूं’, पर ऐसा लगता है कि राहुल गांधी के इस जुमले का कोई अनुकूल असर उत्तराखंड राज्य की कांग्रेस इकाई ,खासकर उधम सिंह नगर जिला कांग्रेस कमेटी के नेताओं-कार्यकर्ताओं पर अब तक नहीं पड़ सका है और वे पार्टी के भीतर मोहब्बत और मेलजोल बढ़ाने के बजाय गुटबाजी की नफरत फैलाने मे लगे हुए हैं।कदाचित यही कारण है कि उत्तराखंड कांग्रेस में प्रदेश से लेकर वार्ड स्तर तक आपसी गुटबाजी नफरत की हद तक पैर पसार चुकी है। वैसे देखा जाए तो गुटबाजी कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है। इंदिरा गांधी के दौर से लेकर आज के मलिकार्जुन खरगे के जमाने तक ,कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी किसी न किसी रूप में अवश्य ही मौजूद रही है। फर्क इतना है कि पहले यह धड़ेबाजी भीतर खाने ढकी छुपी रहती थी और आज कल कांग्रेसी नेताओं की आपसी गुटबाजी पूरी तरह सतह पर आ चुकी है और नफरत की हद को छूती दिख पड़ती है। कांग्रेसी नेताओं- कार्यकर्ताओं की यह खेमेबाजी समूचे उत्तराखंड में कांग्रेस के प्रायः हर छोटे-बड़े कार्यक्रम में खुलकर नुमाया हो रही है। कांग्रेस संगठन और पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच गहरे मतभेद हैं और दोनों ही अपने- अपने भोंपू अपने ही सुरताल में बजा रहे हैं। हालात यह हैं कि कांग्रेस पार्टी के भीतर, गुट में ही कई गुट देखने को मिल रहे हैं। नतीजतन कांग्रेस के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और संगठन के पदाधिकारियों के मध्य किसी भी प्रकार का कोई भी तालमेल दूर-दूर तक नहीं नजर आ रहा है। इसका सीधा असर कांग्रेस पार्टी की संघर्ष क्षमता पर पड़ रहा है और उसके सारे अस्त्र-शस्त्र भोथरे से पड़ गए जान पड़ते हैं। ऐसे में किसी राजनीतिक दल से जनहित के किसी अहम मसले पर किसी निर्णायक संघर्ष की अपेक्षा नहीं की जा सकती। वैसे भी कांग्रेस विपक्ष में रहने के दौरान कठिन जमीनी लड़ाई लड़ने में कम ही विश्वास रखती है। अमूमन होता ऐसा है कि किसी भी चुनाव से बमुश्किल दो-तीन माह पहले कांग्रेसी नेताओं की जड़ता टूटती है और वह कुछ तात्कालिक मुद्दों को पकड़कर, हायतौबा मचाते हुए चुनाव लड़ लेती है और हारने के उपरांत दोबारा गहरी जड़ता की अवस्था को प्राप्त हो जाती है। उसके बाद जन सामान्य की दुश्वारियों और जद्दोजहद से उसका कोई वास्ता नहीं रह जाता। इस दौरान अगर बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने की तर्ज पर कोई बड़ा मसला कांग्रेस के हाथ आ भी गया, तो वह नींद में ही थोड़ा बहुत हाय तौबा मचाकर फिर कुंभकरण बन कर रह जाती है। कांग्रेस पार्टी का ऐन यही चरित्र इन दिनों उत्तराखंड में भी साफ-साफ देखा जा सकता है। गुजरे दिनों उत्तराखंड में राज्य की सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने के नाम पर अनेक गरीबों के सर की छत छीन ली गई और रोजगार के ठीए को तहस-नहस कर दिया गया। ऐसे में प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस का यह कर्तव्य था कि वह पूरे दमखम के साथ गरीबों के बीच खड़ी दिखाई देती और सूबे की भाजपा सरकार की ईट से ईट बजा देती। मगर अफसोस कि कांग्रेस पार्टी इस मसले पर सरकार विरोध की रस्म अदायगी मात्र करती दिखाई पड़ रही है और विडंबना तो यह कि रस्म अदायगी वाले ऐसे कांग्रेसी आयोजनों में भी कांग्रेसी नेताओं की आपसी गुटबाजी का बोलबाला है। बात उधम सिंह नगर जिले की करें तो अतिक्रमण हटाओ अभियान के अंतर्गत किच्छा में उजाड़े गए लोगों के पुनर्वास को लेकर, कद्दावर कांग्रेसी नेता एवं किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ द्वारा कुछ रोज पहले जिला मुख्यालय में आयोजित धरना प्रदर्शन कार्यक्रम में, कांग्रेस संगठन के पदाधिकारियों एवं उनके चेले-चपाटो ने किसी प्रकार की भागीदारी नहीं की और बेहड़ वाले कार्यक्रम के दो दिन बाद ही जिला कांग्रेस कमेटी की ओर से किच्छा में विरोध प्रदर्शन के लिए एक अन्य कार्यक्रम के आयोजन की योजना बना ली। इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस पार्टी की ताकत दो भागों में बंट गई और दोनों ही कार्यक्रम अपेक्षित राजनीतिक प्रभाव नहीं छोड़ सके। जबकि कांग्रेस की दृष्टि से बेहतर तो यही होता कि जिला कांग्रेस कमेटी किच्छा विधायक की वरिष्ठता एवं राजनैतिक अनुभव का सम्मान करते हुए उनके मार्गदर्शन में एक संयुक्त और बड़ा कार्यक्रम करती। जिसका शासन-प्रशासन पर कुछ प्रभाव भी पड़ता और पीड़ितों को भी लगता कि कांग्रेस पार्टी पूरी ईमानदारी और दमखम से उनके साथ खड़ी है। खैर, कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों का विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रम संपन्न हो चुके हैं और फिलहाल कांग्रेस जनों के मध्य बहस यह चल रही है कि किसका कार्यक्रम ज्यादा सफल रहा ? बेहड़ का या गाबा का ? वैसे जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा किच्छा में आयोजित विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम के बारे में कांग्रेसी जिलाध्यक्ष हिमांशु गाबा ने दावा तो यही किया था कि यह कार्यक्रम ऐतिहासिक होगा। अब यह कार्यक्रम कितना ऐतिहासिक रहा और उसने किच्छा में इतिहास के कौन से नए पत्थर गाड़ दिए ? यह तो हिमांशु गाबा ही जाने, पर इतना तो तय है कि अगर कांग्रेस पार्टी के नेता कार्यकर्ता छोटे-छोटे कार्यक्रमों में भी ऐसी ओछी गुटबाजी करते रहे, तो कांग्रेस पार्टी का उत्तराखंड के भीतर किसी बड़ी राजनीतिक लड़ाई को जीत पाना बड़ा ही दुष्कर होगा। फिलहाल तो कांग्रेस की दशा-दिशा देख यूं जान पड़ता है, जैसे कांग्रेस पार्टी महलों में कैद होकर रह गई है और अब इसे जनता के बीच लाकर खड़ा करने की सख्त जरूरत है। देखना होगा कि कांग्रेस की तरफ से यह पहल कब और कैसे होती है? तकरीबन आठ-दस माह बाद ही कांग्रेस पार्टी को लोकसभा चुनाव में विश्व की सबसे बड़ी एवं साधन संपन्न पार्टी से लोहा लेना है। साथ ही अगर स्थानीय निकाय के चुनाव समय पर हुए तो कांग्रेस पार्टी को दोनों में से किसी भी चुनाव में चुनावी लड़ाई की तैयारी करने का इफरात समय नहीं मिल पाएगा। ऐसे में कांग्रेस के लिए यह आवश्यक है, कि वह है समय रहते अपना संगठन दुरुस्त करें आंतरिक लड़ाई को खत्म करें और धरातल पर कमजोर लोगों के साथ खड़ी नजर आए तभी उसके अच्छे दिन आने की थोड़ी बहुत संभावना बन पाएगी।

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