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राष्ट्रावाद का ‘राजनीतिकरण’ जनमुद्दों पर हावी

2019 के लोकसभा चुनाव के लिये अब स्टार प्रचारकों के भाषणों की गूंज वोटरों की खामोशी तोड़ने लगी है। आम चुनाव में इस बार प्रदेश की जनता का मूड भांपने के लिये सियासी दलों ने प्रचार अभियान की धार तेज कर दी है। अबकी बार चुनावी मुकाबले में भाजपाई मै भी चैकीदार तो कांग्रेसी मै भी बेरोजगार का नारा बुलंद करने में जुटे है वायुसेना की एयरस्ट्राइक सेे जहां सत्तारूढ़ भाजपा का जोश हाई है तो विपक्ष पुलवामा की घटना पर मोदी सरकार की घेराबंदी कर रही है। चुनावी प्रचार में सियासी दलों के नेता एक दूसरे को पाकिस्तान समर्थक बनाने से गुरेज नहीं कर रहे। लिहाजा राष्ट्रवाद का राजनीतीकरण अब जनमुद्दों पर हावी होता दिख रहा है। सत्तारूढ़ दल भाजपा अपने चुनाव प्रचार में राष्ट्रवाद को मुद्दा बना रही है जबकि विपक्ष दल कांग्रेस भी अतीत की याद दिलाकर स्व- इंदिरा गांधी के बुलंद हौसलों का गुणगान करने से पीछे नहीं हट रहे। बहरहाल राष्ट्रवाद के इस मुद्दे को लेकर देश की जनता को एकजुट तो किया जा सकता है साथ ही राष्ट्रवाद को सबसे बड़ा मुद्दा भी माना जाये तो देश में अन्य जनमुद्दों पर सत्तासीन भाजपा दल की खामोशी उचित नहीं लग रही है। इधर चुनावी घोषणा पत्र में कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गांधी की न्याय योजना और किसानों के कर्जमाफी,रोजगार समेत अन्य कार्ययोजनाओं के ऐलान के बाद कांग्रेस भी जोश में आ गई है। पिछले 2014 के लोकसभ चुनाव में उत्तराखंड का जनादेश सभी पांचों सीटो ंपर भाजपा के पक्ष में गया जबकि इससे पहले के 2009 के चुनाव में यह जनादेश कांग्रेस के पक्ष में गया था। अब एक बार फिर 2019 के चुनाव में सबकी निगाहे प्रदेश की जनता के इसी एकतरफा जनादेश पर टिकी हुई है। इस चुनाव में जनमुद्दों को लेकर भी लोगों में उत्सुकता है। जबकि किसानों के कर्जमाफी और न्याय योजना को लेकर भी वोटर आशंकित है वहीं उत्तराखंड में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में विकास एंवं पुनर्निमार्ण कार्यों,शहरी क्षेत्रों को स्मार्ट सिटी बनाने,पलायन को रोकने,बिजली,पेयजल,शिक्षा,स्वास्थ्य ,ग्रीन बोनस, विशेष राज्य का दर्जा, आपदा राहत पैकेज,स्थानीय उत्पादों की मार्केटिंगके साथ ही स्थायी राजधानी को लेकर भी प्रदेशवासी अपने वोट से जवाब देने को तैयार है। वहीं प्रदेश के सरकारी महकमों में व्याप्त भ्रष्टाचार के मामलों,शराब की बिक्री,नशे के कारोबार, महिला सुरक्षा के साथ ही शहरी क्षेत्र में कानून व्यवस्था,मलिन बस्तियों का विकास, नजूल नीति लागू कराने,यातायात व्यवस्था,श्रमिकों की समस्याओं,सड़कों के गड्ढे भरने,कूड़ा निस्तारण,सीवर ट्रीटमैंट,निजी स्कूलों की मनमानी जैसे मुद्दों पर नेताओं की चुप्पी जनभावनाओं को कमजोर कर रही है। बहरहाल आगामी 11 अप्रैल को मतदान होगा, जिसके नतीजे भी 23 मई को आ जायेगे। चुनाव प्रचार के लिये भाजपा और कांग्रेस के दिग्गज स्टार प्रचारक भी एक दूसरे की आलोचनायें करते नहीं थक रहे है जबकि विकास योजनाओं और जनता से जुड़े मुद्दों पर सत्तासीन नेता खामोश रहने में भलाई समझ रहे है। भाजपा ने अब अपना पूरा फोकस सिर्फ पीएम मोदी पर जमा दिया है लिहाजा भाजपा के फायरब्रांड नेता यानी ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ एक बार फिर सत्ता में वापसी करना चाहते है। जबकि सत्ता में अपनी वापसी के लिये कांग्रेस भी पूरी ताकत के साथ चुनावी रण में उतर गई है। इस बार देश की सियासत में एक और लोकप्रिय चेहरा ‘प्रियंका गांधी वाड्रा’ का भी दिखाई दे रहा है जो कांग्रेस के लिये संजीवनी बन सकती है। देश में जिस प्रकार पीएम मोदी की लोकप्रियता बढ़ रही है वहीं नमो की इस लोकप्रियता को अब पूर्व पीएम स्व- इंदिरा गांधी की पोती प्रियंका गांधी को मिल रही सहानुभूति से चुनौती मिल रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार राजनीति में सत्तारूढ़ दल की आलोचना करने से जहां विकास को गति दिलायी जा सकती है वहीं देश में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिये यह बेहद जरूरी भी है। मौजूदा मोदी सरकार के िखलाफ कांग्रेस भी मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में अपना प्रभाव दिखा रही हैं साथ ही सत्ता पक्ष पर राफेल डील को लेकर तथाकथित रूप से मनमाफिक डील को भ्रष्टाचार से जोड़कर सवाल उठाये गये है। जबकि वर्ष 2014 के चुनाव में कांग्रेस को सत्तासे बाहर करने के लिये भाजपा नेताओं के साथ ही खुद पीएम कैंडिडेट के रूप में मोदी ने मनमोहन सरकार की नीतियों पर जमकर आलोचनायें की थी। इन्ही आलोंचनाओं का असर चुनाव में भी देखने को मिला जब केंद्र में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब भी हो गई। अब 2019 के चुनाव में एक बार फिर एक दूसरे की सरकारों और नीतियों की आलोचनायें होने लगी है। हालांकि यह महज संयोग लगता हो कि जिस प्रकार देश में बैंको को चूना लगाने वाले बड़े कारोबारी विदेश भाग गये और सरकार अब तक उनके िखलाफ कार्यवाही नहीं कर पायी है वहीं विदेशों में जमा देश के अमीरों का कालाधन का खुलासा या फिर वापिस लाने की योजना भी फलीभूत नहीं हुई है। इस तरह भ्रष्टाचार की वजह से देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित है। देश में विकास और रोजगार के मुद्दे प्रदेश स्तर पर भी उठाये जा रहे है। हालांकि कई ऐसे प्रदेश है जहां औद्योगिक क्षेत्र काफी समय पूर्व से विकसित है। यहां रोजगार के लिये देशभर के युवा आ रहे है। लेकिन ठेकेदारी प्रथा का प्रबंधन कई बार श्रमिकों के लिये परेशानी का सबब बनता है। प्रदेश के ऊधमसिंहनगर पंतनगर औद्योगिक क्षेत्र भी नैनीताल लोकसभा क्षेत्र में आता है जबकि देहरादून के सेलाकुई का औद्योगिक क्षेत्र टिहरी तो हरिद्वार का सिडकुल क्षेत्र में श्रमिकों की समस्याओं को लेकर आये दिन आंदोलन होते रहते है। इन अस्थायी श्रमिकों के लिये सरकार की योजनायें नाकाफी साबित हुई है जबकि न्यूनतम मजदूरी को लेकर भी मांग उठायी जाती रही है। देशवासियों में एयर स्ट्राइक के बाद देशभत्तिफ का जोश भी काफी हाई है लिहाजा मोदी सरकार एक बार फिर जनता में यह विश्वास पैदा करना चाहती है कि राष्ट्रवाद को मजबूती देने के लिये वह किसी भी दायरे को तोड़ सकती है। फिर चाहे वह पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकवाद को मिटाने की बात हो या फिर विदेश नीति को धार देकर माहौल अपने पक्ष में करने की कार्यशैली से अब तक मोदी खरे उतरे है। हांलाकि उत्तराखंड समेत अन्य प्रदेशों के जवानों की शहादत हो या फिर सेना के जवानों को बुलेट प्रूफ जैकेट,अर्धसैनिक बलों को शहीद का दर्जा,ओआरओपी की खामियों को दूर करने के साथ मांगों का हल निकालने की आवाज आये दिन लोग उठाते रहे है। इतना ही नहीं देश के कोने कोने से भी आवाज उठती रही है कि अब पाकिस्तान के िखलाफ आर पार की लड़ाई शुरू कर आतंकवादियों का समूल नाश किया जाये। वहीं आतंकवादियों के आका मसूद अजहर और हाफिज सईद का खात्मा भी किया जाये। चीन और पाकिस्तान को लेकर वरिष्ठ नेताओं में मोदी का सधा हुआ अंदाज भी भारत को मानसिक रूप से मजबूत करता है। पिछले पांच वर्ष के कार्यकाल में मोदी सरकार की उपलब्धियों जिसमें नोटबंदी,जीएसटी, रोजगार, विकास और स्वरोजगार के लिये काम करने का दावा भी जनता को उत्साहित कर रहा है। जबकि भ्रष्टचार के िखलाफ मोदी सरकार आक्रामक दिखती है। देश के सबसे बड़े भगौड़े कारोबारी नीरव मोदी की कोठी को विस्फोट से उड़ाने की कार्यवाही भले ही जनता के भावनाओं को शांत करती हो मगर वह मानती है अब तक देश की गरीब जनता का पैसा वापिस नहीं आया है। जबकि अब तक किसानों से किये गये वायदे पर सरकार ने पलटी मारते हुए जहां इस मुद्दे को नयी दिशा देकर प्रति माह 6 हजार रूपये की आर्थिक मदद करने की योजना लागू कर दी है। वहीं कांग्रेस पार्टी द्वारा अपने घोषणा पत्र में अंकित की गई न्याय योजना से देश के 25 करोड़ गरीबो को लगभग 72 हजार रूपये प्रतिवर्ष उनके खाते में डालने का दावा कर दिया है। कांग्रेस की इस योजना को लेकर भले ही भाजपा विरोध उतना नहीं कर रही है जितना वह कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिये कर रही है। लिहाजा कांग्रेस की यह स्कीम जनता के जेहन में उतरी है या नहीं यह भी चुनाव के बाद साफ हो जायेगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने चुनावी घोषणा पत्र के रूप में देश के सभी गरीब परिवारों को 72 हजार रुपये सालाना देने के ऐलान के बाद आम लोग इसे फायदेमंद तो मान रहे हैं लेकिन इस बात पर कोई यकीन करने को तैयार नहीं है। हांलाकि किसी भी स्कीम पर इतनी आसानी से यकीन नहीं किया जाता हो मगर इस सरकार स्कीम को लेकर ज्यादातर मतदाताओं ने इसे काफी लाभकारी बताया, लेकिन इसके फलीभूत होने पर वह यकीन करने को तैयार नहीं हैं। राहुल गांधी की ओर से देश के गरीब परिवारों को 72 हजार रुपये देने का वादा भी मतदाताओं का मन प्रभावित करती दिख रही है। हालांकि आम लोगों के मन में इसको लेकर उत्सुकता जरूर है, लेकिन भरोसा कम लोगों को हो रहा है। मतदाताओं की राय है कि चुनावों से पहले हर पार्टी के तरफ से इस तरह की घोषणा की जाती है, जिसका चुनाव बाद कोई औचित्य नहीं होता है।कांग्रेस का कहना है कि 72 हजार रुपये प्रतिवर्ष किसी को देना सामाजिक न्याय को साकार करना है। अगर समाज के आर्थिक दृष्टिकोण से सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों को छह हजार प्रतिमाह दिया जाए तथा उस रकम को अर्थव्यवस्था के बेहतरीन इस्तेमाल किया जाए तो गरीबी हटाने के लिये इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है। मोदी सरकार में लागू हुई आयुष्मान भारत योजना में करीब 50 करोड़ लोगों को लाभान्वित किये जाने का लक्ष्य रखा गया है। मगर शुरूआत में इस योजना का क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं होना भाजपा सरकार के लिये चुनौती बन सकती है। हांलाकि उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले बेरोजगार युवा भी सरकारी नौकरी के साथ अब स्किल ऐजुकेशन को फॉलो कर रहे है। जबकि पिछले दिनों गरीब वर्ग के लिये नौकरी और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का ऐलान किया गया है। कुलमिलाकर देखा जाये तो मोदी सरकार में जनमुद्दों को लेकर सकारात्मक पहल हुई है को अब जनता केंद्र सरकार के कामकाज के साथ प्रदेश सरकार व विधायकों की परफॉमेंस को परखने के लिये तैयार है। जबकि कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गांधी यानी कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र के अनुसार देश में न्याय योजना व कर्जमाफी के साथ ही किसानों के लिये अलग बजट की व्यवस्था को कितना जनसमर्थन हासिल होता है यह आगामी 23 मई को दिख जायेगा।
गौ माता के लिये सिर्फ एक प्रत्याशी ने उठायी आवाज
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ‘गाय‘ को पूज्यनीय माना तो गया है मगर अब देश में गाय एवं अन्य गौवंशों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा बना है। सदियों से गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के साथ ही गंगा की निर्मलता और अविरलता की मांग उठायी जाती रही है। इस माग को लेकर हिंदू समाज के साथ ही कुछ मुस्लिम संगठन के लोग भी आगे आकर आवाज उठा रहे है। पिछले लोकसभा के चुनाव में भी हिंदूवादी संगठनों ने गौ रक्षा के लिये कानून बनाने और उसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठायी थी। लेकिन पांच वर्ष के कार्यकाल में मोदी सरकार इस मांग को पूरा नहीं पायी है। हांलाकि आम बजट में मोदी सरकार ने गौ रक्षा के लिये अगल मंत्रालय बनाने की कार्ययोजना तैयार की हो मगर आज भी विभिन्न राज्यों में सड़कों पर आवारा घूम रहे गौवंशों के लिये ठोस व्यवस्था नहीं हुई है। जबकि सियासी दलों के नेताओं ने तो इस मांग को अपने मैनिफेस्टों में जगह तक देना जरूरी नहीं समझा। बहरहाल देश की जनता की यह बहुप्रतीक्षित मांग को लेकर कई समाजसेवी संगठन जागरूकता तो फैला रहे हैं मगर सिर्फ जागरूकता से गौमाता का सम्मान नहीं हो सकता है। इधर राजधानी देहरादून में भी पिछले दिनों गौ रक्षा के लिये मुहिम शुरू की गई है। इसके लिये बकायदा प्रदेश सरकार ने विधानसभा में गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का संकल्प भी पारित किया गया था। देवभूमि उत्तराखंड में भी गौ रक्षा के लिये अभियान तो चलाये गये हैं मगर अब आम चुनाव में प्रदेश की पांच लोकसभा सीटों पर चुनाव होने है। जबकि 2019 लोकसभा चुनाव में एक संत ने तो सिर्फ गौ माता की रक्षा के लिये निर्दलीय चुनाव में कूद पड़े है। वह प्रचार प्रसार के संसाधनों के बिना ही अपनी मुहिम को लोगों के बीच पहुंचा रहे है। गौ रक्षा के प्रति उनकी भावनायें लोगों को अपनी ओर आकर्षित भी कर रही हैं। हांलाकि चुनावी माहौल में इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई भी बड़े दल आवाज नहीं उठा रहे हों मगर गोपाल मणि महाराज कीे इस मुहिम की चहुंओर से भावनात्मक समर्थन मिल रहा है। वहीं पिछले वर्ष स्व-स्वामी सानंद द्वारा गंगा व अन्य नदियों की निर्मलता और अविरलता का मुद्दा भी चुनावी प्रचार के शोर में न जाने कहां गुम हो गया है।

(एन0एस0बघरी‘नरदा’)

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