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स्वामी रामदेव के बयान पर हरीश रावत ने तोड़ी चुप्पीः अभी तो कोरोना वायरस का संपूर्ण उपचार नहीं ढूंढ पाई है..

एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में भी सभी धर्मो के लोगों का योगदान
देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस महासचिव हरीश रावत ने एलोपैथी बनाम आयुर्वेद को लेकर छिड़ी बहस के बीच इशारों में बाबा रामदेव और बालकृष्ण पर सोशल मीडिया के जरिये पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक व व्यावसायिक लाभ के लिए किसी भी चिकित्सा पद्धति को धर्म विशेष या देश विशेष से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में योगदान देने वालों में केवल क्रिश्चियन ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों के मानने वाले लोग भी हैं। कोरोना संक्रमित होने के बाद दिल्ली एम्स में खुद के भर्ती होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि डाक्टरों ने उन्हें कुछ योग व गले को साफ करने के लिए अश्वगंधा और सितोपलादि चूर्ण का उपयोग करने की सलाह दी। साथ डायबिटिज को नियंत्रण में रखने को यूनानी दवा जालीनूस का उपयोग करने को कहा। उन्होंने कहा कि समन्वय हमारी सनातन परंपरा है। विभिन्न पद्धतियों के साधकों में कटुता बढ़ाने के बजाय सभी पद्धतियों की दवाइयों का डाक्टर्स की सलाह पर उपयोग किया जाना चाहिए। कांग्रेस महासचिव हरीश रावत ने कहा कि डूबते को शब्दों का सहारा भी होता है। संक्रमित व्यत्तिफ के विश्वास को, उसको दी जा रही दवा और चिकित्सा कर रहे डाक्टर के प्रति कमजोर करना आपराधिक कृत्य है। उन्होंने आयुर्वेदाचार्यों व शोधकत्र्ताओं से कोरोना वायरस की तोड़ खोजने और उसकी पुष्टि सरकार से कराने का अनुरोध किया। किसी भी भारतवासी को आयुर्वेदिक दवाइयों से कोरोना का मुकाबला करने में आत्मिक प्रसन्नता होगी। एलोपैथिक पद्धति के विकास में भारत व भारतीयों का भी बड़ा योगदान है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं हरिद्वार के पूर्व सांसद हरीश रावत ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए आपसी सौहार्द बनाये रखने की अपील की है। सोशल मीडिया पर अपनी फेसबुक पोस्ट में उन्होंने बाबा रामदेव व बालकृष्ण का सीधे नाम नहीं लिया, लेकिन यह जरूर कहा कि एलोपैथी बनाम आयुर्वेद की बहस को गलत दिशा में आगे नहीं बढ़ने देना चाहिए। एलोपैथी को किसी के पक्ष की आवश्यकता नहीं है। कोरोना संक्रमण से जो लोग बचे हैं, उन सबका उपचार एलोपैथिक पद्धति से हुआ। आयुर्वेद की पहचान भारत से है। यह हमारे प्राचीनतम वेदों से निकली हुई चिकित्सा पद्धति है। कंपनियां चाहे आयुर्वेदिक दवाइयां बना रही हों या कोई और पद्धति की, उन्हें विवाद से प्रचार मिलता है। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस हाल में आया है। शायद इसीलिए आयुर्वेद सहित अन्य चिकित्सा प्रणालियों में वायरस से निपटाने की दवाइयों का उल्लेख नहीं हुआ होगा। प्राचीन समय प्रकृति स्वस्थ व स्वच्छ थी। कोरोना वायरस हमारी गलतियों का परिणाम है। अभी तो एलोपैथिक भी कोरोना वायरस का संपूर्ण उपचार नहीं ढूंढ पाई है। वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहे हैं। डाक्टर उस अनुसंधान के आधार पर प्रचलित दवाइयों का उपयोग कर संक्रमितों को बचाने का काम कर रहे हैं।

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