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सवालों के घेरे में ‘धामी सरकार’ का भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’: दागी नौकरशाह को बनाया ओएसडी

देहरादून। आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाएं निदेशालय देहरादून में विशेष कार्याधिकारी ;ओएसडीद्ध पद पर दागी एवं विवादित नौकरशाह मृत्युंजय मिश्रा की नियुक्ति के बाद, सूबे के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस की नीति की कलई खुलना आरंभ हो गई है। बताना होगा कि मृत्युंजय मिश्रा पर एक समय भ्रष्टाचार एवं आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के गंभीर आरोप लगे थे और इन्हीं आरोपों के चलते उन्हें काफी समय तक जेल में भी रहना पड़ा था और वे वर्तमान में उपरोक्त मामलों में जमानत पर चल रहे हैं । मजे की बात तो यह है कि एक दागी नौकरशाह को ओएसडी का पद देकर पुरस्कृत किए जाने का मामला ऐन उस समय सामने आया है,जबकि कुछ दिन पूर्व ही सुबह के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा भ्रष्टाचार के चार आरोपियों के विरुद्ध विजिलेंस जांच का आदेश देने पर ,उनकी प्रदेश भर में जमकर वाहवाही हो रही थी ।लेकिन दागी नौकरशाह को विशेष कार्याधिकारी बनाए जाने के बाद, मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के दोहरे मानदंड अब सवालों के घेरे में आ गए हैं और उत्तराखंड की फिजाओं में यह सवाल उछलने लगा है कि ऐसी कौन सी मजबूरी है ? जिसके चलते एक दागी नौकरशाह मुख्यमंत्री का चहेता बना हुआ है और उसे उसी विभाग का सर्वेसर्वा बना दिया गया है जहां उसने भ्रष्टाचार को अंजाम दिया है। आशंका तो यह व्यक्ति की जा रही है कि कहीं उपरोक्त नौकरशाह को अपने काले कारनामों की लीपापोती करने का अवसर प्रदान करने के लिए तो इस पद पर नियुक्त नहीं कर दिया गया ? गौरतलब है कि राजकीय महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में उत्तराखंड आए डॉक्टर मृत्युंजय मिश्रा का आरंभ से ही गहरे विवादों से नाता रहा आया है और वह सत्ता के गलियारों में अपनी-गहरी गहरी पैठ के लिए जाने जाते रहे हैं। कदाचित इसी गहरी पैठ के चलते उन्हें पहले उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय मे और उसके बाद आयुर्वेद विश्वविद्यालय का कुलसचिव बना दिया गया। यह अलग बात है कि यह तथ्य आज तक सामने नहीं आ पाया की एक राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक मे आयुर्वेद या तकनीकी जैसे विशिष्ट विषय के विश्वविद्यालय का,कुल सचिव होने की कौन सी विशिष्ट योग्यता पाई गई ? बहरहाल कुलसचिव रहते हुए ही उन पर घोटालों के गंभीर आरोप लगे और नवंबर 2018 में मुकदमा दर्ज होने के बाद 3 दिसंबर 2018 को उन्हें विजिलेंस द्वारा एक करोड़ से अधिक के घोटाले के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। उपरोक्त मामले में विजिलेंस द्वारा उनकी पत्नी तथा ड्राइवर को भी आरोपी बनाया गया। इतना ही नहीं उसके बाद मई 2019 में उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला भी दर्ज किया गया। विजिलेंस ने मृत्युंजय मिश्रा की 12 करोड़ की संपत्ति पकड़ने के दावे के साथ, मार्च 2019 में मिश्रा के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में उत्तराखंड शासन से मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी गई और अनुमति मिलने के बाद मई 2019 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। मृत्युंजय मिश्रा 16 अगस्त 2021 को उच्चतम न्यायालय से सशर्त जमानत पर रिहा हुए और दिसंबर 2021 में ही उन्हें बहाल करते हुए, दोबारा उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय का कुलसचिव बना दिया गया। लेकिन उनकी यह नियुक्ति विवादास्पद हो गई तथा उनकी बहाली और निलंबन अवधि के संपूर्ण वेतन भुगतान के साथ पुनः उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के कुलसचिव पद पर नियुक्त किए जाने को विधि सम्मत नहीं माना गया तथा उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर सुनील जोशी ने मृत्युंजय मिश्रा को ज्वाइन कराने से इंकार कर दिया और आदेश जारी कर दिया की मिश्रा को कोई भी फाइल ना दिखाई जाए ।अंततः 24 जनवरी 2022 को मिश्रा को आयुष एवं आयुष शिक्षा विभाग से संबद्ध कर दिया गया मिश्रा तब से 25जून 2023 तक वही संबद्ध रहे। मृत्युंजय मिश्रा को ओएसडी बनाने का फैसला भी खासा हैरत में डालने वाला है क्योंकि जहां वे डेढ़ साल तक संबद्ध रहे वहीं उनके लिए बकायदा विशेष कार्य अधिकारी का पद सृजित किया गया तथा ओएसडी नियुक्त कर दिया गया । लिहाजा इस प्रकरण पर यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या उत्तराखंड में ईमानदार एवं स्वच्छ छवि वाले अफसरों की कमी है ? जो भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे व्यक्ति को आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाएं निदेशालय देहरादून में विशेष कार्य अधिकारी नियुक्त कर दिया गया ? और क्या यही है उत्तराखंड सरकार की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति?

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