February 14, 2026

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ओजस्वी रंगकर्मी इंद्रमणि बडोनी ने बागेश्वर में की थी गैरसैंण को राजधानी बनाने की घोषणा

हल्द्वानी। उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन की शुरुआत करने वाले इंद्रमणि बड़ोनी को उत्तराखंड का गांधाी यूं ही नहीं कहा जाता है, इसके पीछे उनकी महान तपस्या व त्याग रही है। राज्य आंदोलन को लेकर उनकी सोच और दृष्टिकोण को लेकर आज भी उन्हें शिद्दत से याद किया जाता है। इंद्रमणि बड़ोनी आज ही के दिन यानी 24 दिसंबर, 1925 को टिहरी जिले के जखोली ब्लाॅक के अखोड़ी गांव में पैदा हुए थे। उनके पिता का नाम सुरेश चंद्र बडोनी था। साधाारण परिवार में जन्मे बड़ोनी का जीवन अभावों में गुजारा था। उनकी शिक्षा गांव में ही हुई और देहरादून से उन्होंने स्नातक की उपाधिा हासिल की थी। वह ओजस्वी वत्तफा होने के साथ ही रंगकर्मी भी थे। लोकवाद्य यंत्रों को बजाने में निपुण थे। वर्ष 1953 का समय, जब बड़ोनी गांव में सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों में जुटे थे। इसी दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधाी की शिष्या मीराबेन टिहरी भ्रमण पर पहुंची थी। बड़ोनी की मीराबेन से मुलाकात हुई। इस मुलाकात का असर उन पड़ा। वह महात्मा गांधाी की शिक्षा व संदेश से प्रभावित हुए। इसके बाद वह सत्य व अहिंसा के रास्ते पर चल पड़े। पूरे प्रदेश में उनकी ख्याति फैल गई। लोग उन्हें उत्तराखंड का गांधाी बुलाने लगे थे। इंद्रमणि बडोनी जब नेता के तौर पर उभर गए थे। वर्ष 1992 में मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर के प्रसि( उत्तरायणी कौतिक से उन्होंने उत्तराखंड की राजधाानी गैरसैंण करने की घोषणा कर दी थी। उत्तराखंड को लेकर इंद्रमणि बडोनी का अलग ही नजरिया था। वह उत्तराखंड को अलग राज्य चाहते थे। वर्ष 1979 में मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल का गठन हुआ था। वह इस दल के आजीवन सदस्य थे। उन्होंने उक्रांद के बैनर तले राज्य को अलग बनाने के लिए काफी संघर्ष किया था। उन्होंने 105 दिन की पद यात्रा भी की थी। तब उत्तराखंड क्षेत्र में बडोनी का कद बहुत ऊंचा हो चुका था। वह महान नेताओं में गिने जाने लगे। सबसे पहले वर्ष 1961 में अखोड़ी गांव में प्रधाान बने। इसके बाद जखोली खंड के प्रमुख बने। इसके बाद देवप्रयाग विधाानसभा सीट से पहली बार वर्ष 1967 में विधाायक चुने गए। इस सीट से वह तीन बार विधाायक चुने गए। हालांकि उन्होंने सांसद का भी चुनाव लड़ा था। कांटे की टक्कर हुई थी। अपने प्रतिद्वंद्वी ब्रहमदत्त से 10 हजार वोटों से हार गए थे। संघर्ष करते हुए बड़ोनी का 18 अगस्त, 1999 को देहावसान हो गया। उक्रांद नेताओं में नई पीढ़ी के युवा नेता कार्तिक उपाध्याय बडोनी के जन्मदिवस पर उन्हें याद करते हैं और कहते हैं, बड़ोनी के सपने को साकार होना है। बड़ोनी जैसे महान नेताओं ने राज्य को जो विजन दिया था, आज तक हमारे नेता उसे पूरा नहीं कर पाए। वह राज्य को समृ( बनाना चाहते थे। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, रोजगार को लेकर बहुत अधिाक सजग रहा करते थे। हालांकि राज्यगठन के बीस वर्ष में भाजपा और कांग्रेस की सरकार आज तक गैरसैंण स्थायी राजधाानी नहीं बना पायी है पहाड़ के लोग पहाड़ में ही राजधाानी बनाने के लिए संषर्घरत हैं। मौजूदा हालात पर नजर डाले तो वर्ष 2012 के बाद ग्रीष्मकालीन राजधाानी भराड़ीसैण में विधाानसभा भवन परिसर का निर्माण कार्य भी भविष्य की रूपरेखा तय कर रहा है।

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