February 11, 2026

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पल में प्रलय करो,छिन में रचना,तुम्हें नही कुछ पुण्य न पाप,तीन लोक के हो तुम स्वामी

गतांक से आगे————मामलेश्वर -तीर्थ की उत्पत्ति के सम्बंध में कथा सुनो-
मामलक ग्राम में महागणपति का स्थान हैं,इसी को मामलेश्वर तीर्थ कहते हैं। पूर्व काल में इसी नाम के भक्त ने यहां पर तपस्या की थी।
भगवान शंकर उस भक्त की तपस्या से प्रसन्न हो गये और अपने ठहरने का स्थान यहां पर ही बना लिया। यहां स्थूलवाट मेें भगवान शिव श्री महागणपति को दो कक्ष्याओं (अर्थात दोनों ड्योढियों) का द्वारपाल बना कर स्थूलवाट से आगे को चल दिये।
भगवान शंकर खिलनक से ऊपर जाकर,दण्डक मुनि के क्षेत्र में क्षणमात्र के लिए विश्राम करने लग गयें। उस समय सभी देवता हर्षयुक्त होकर उस स्थान पर आ गये। देवताओं को देखकर, भगवान शिव बड़े ही ऊंचे स्वर से कहने लगे- ‘‘देवताओ!आगे मत बढ़ो,आगे मत बढ़ो!’’ इस प्रकार मा,मा (मत,मत) कहने लगे। भगवान शिव के शब्द को सुनकर,स्वयंभू अनादिकाल से वर्तमान श्री महागणपति,अत्यन्त शीघ्रता से पाताल से वहां आये और स्वयं कुल्हाड़ी हाथ में लेकर देवताओं से ‘मा,मा’कहने लगे।
इस प्रकार सभी देवता उसी शब्द मेें लीन हो गये। इस स्थान में देवता लोग सत् चित आनन्द स्वरूप परब्रह्म में लीन हो गये, अर्थात मोक्ष को प्राप्त हो गये। अतः यह स्थान मामल नाम से प्रसिद्ध हो गया।
गणपति से डरे हुए देवताओं को देखकर ,भगवान शिव स्वयं गणपति से बोले,‘‘गणेश! जिस ‘मा मा’शब्द को सुनकर आप यहां पर आये हो उसी के अनुरूप तुम यहां पर ही ठहरो और विघ्नों का नाश करते रहो।
जो भी मनुष्य यहां आकर तुम्हारी पूजा करेगा,वह सर्व प्रकार के विघ्नों से दूर होकर सिद्धि प्राप्त कर लेगा।’’
यहां पर महागणपति की पूजा करने वाला मनुष्य धन, पुत्र, लोभ ,यक्ष ,मोक्ष इत्यादि की कामनाओं पर विजय प्र्राप्त कर लेता हैं। जो मनुष्य वैशाख-शुक्ल -चतुर्दशी को उपवास के साथ रात्रि-जागरण,श्री गणेश के सामने करता है,श्री गणेश का पूजन करता हैं,वह इस संसार में अपनी सभी कामनाओं की पूर्ति कर लिया करता है और अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। गणेश-चतुर्थी को मामेश्वर के समीप श्री गणेश की जो पूजा करता है तो वह अनन्त पुण्य प्राप्त कर लेता है। जो श्री गणेश की पूजा कर मामेश्वर की पूजा करता है,उसका पुनः जन्म नहीं होता हैं।
भगवान शिव ने गणेश को वर दिया और स्वयं दण्डक-वन में लीन हो गये। मामेश्वर कुण्ड में स्नान,मामेश्वर -लिंग के दर्शन, गणपति के पूजन-अर्चन सेे अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं । जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहकर जल से लिप्त नहीं होता हैं,उसी प्रकार सांसारिक बंधनों में रहकर भी मनुष्य, सुकाम अथवा निष्काम भाव से,मामेश्वर विघ्नराज के दर्शन करके,समस्त पापोें से छूट जाता है। इस मामलेश्वर तीर्थ के महात्म्य के सुनने,पढ़ने तथा कहने से ही मनुष्य समस्त विघ्नों से छूट जाता है।
भृगुपति-तीर्थ
इसके पश्चात् समस्त पापों को मिटाने वाले भृगुपति तीर्थ जाकर वहां विधिवत स्नान तथा दान करके भगवान श्री हरि का पूजन करे। भृगुजी ने परिशीलन वन में दीर्घकाल तक बड़ा भारी तप किया था। ऐसा कठिन तप,जो देवता भी न कर सकते थे। इसी बीच मे भगवान श्री विष्णु देवताओं के साथ महर्षि भृगुजी के दर्शनों कें लिए आये। भृगुजी ने अपने आसन पर से उठकर उनको प्रणाम किया और सदैव एकरस रहने वाले भगवान श्री विष्णु ने उनके सिर को चूमकर उनको गले से लगा लिया।
हे माहेश्वरी ! भृगु और विष्णु भगवान ने आपस में आलिंगन किया। उनके शरीर में से पवित्र पसीना निकला जिससे यह पवित्र तीर्थ बना।
श्री सदाशिव बोले-हे देवी क्योंकि यह तीर्थ भृगु के पसीने से बना हैं,अतः इसका नाम भृगु तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। यहां पर जो मनुष्य स्नान करके तांबे तथा वस्त्र का दान करेगा,उसकी यात्र निःसंदेह सफल होगी। यहां पर स्नान करने से मनुष्य अति उत्तम पुण्य प्राप्त होता है।
श्री लम्बोदर की कथा
एक बार कैलाश पर्वत पर ,भगवान श्री सदाशिव और श्री पार्वती, ज्ञान-संबंधी बातचीत कर रहे थे। उन्होंने श्री गणेशजी को द्वारपाल बनाकर उनसे कह रखा था कि किसी को अंदर मत आने देना। इतने में देवराज इन्द्र देवताओं सहित वहां आ गये। गणेश जी ने उनकों रोका,इस पर दोनों में बड़ा भारी युद्ध हुआ। इन्द्र हार गये। इन्द्र के साथ लड़ने से श्रीगणेश जी को बहुत भूख व प्यास महसूस हुई। चुनांचे नामक स्वादिष्ट फल अत्याधिक खाकर तथा बहुत सा- गंगाजल पीने से श्री गणेश जी का पेट बढ़ गया। तब भगवान श्री सदाशिव जी ने गणेश जी को लम्बोदर के नाम से पुकारा और गंगा को सूखा देख श्री गणेशजी के पेट पर क्रोध में भरकर डमरू से चोट कर दी। फिर गंगा उनके पेट से निकलकर बहने लगी और पौराणिक कथाओं में उसका नाम लम्बोदरी प्रसिद्ध हुआ।
हे प्रिये! लम्बोदरी- नदी के जल का स्पर्श कोटि-जन्मों के पापों का नाश करता है। इसलिए मामलेश्वर के पास इस नदी का स्पर्श करना आवश्यक हैं।इसके पश्चात् रन्जिवन में गोला कार-पत्थर की देव-मूर्ति का दर्शन करें और वहां से सीताराम-कुण्ड में स्नान करके आगे बढ़ें।———–क्रमशः

पिस्सू घाटीः जहां पर देवताओं ने राक्षसों की हड्डियों का बनाया था चूर्ण
भगवान शिव ने निर्जन गुफा की ओर बढ़ने से पहले इस स्थान पर अर्थात ‘शेषनाग’ नामक झील पर अपने गले से सर्पो की मालाओं को उतार दिया था। सम्भवतः इसी कथा के आधारभूत शेषनाग पर्वत पर नागों की आकृतियॉ विद्यमान है। यह चन्दनवाड़ी से 13 किमी दूर हैं और समुद्रतल से 11730 फीट ऊंचाई पर है। यहां डाक बंगला भी है, परन्तु यात्र काल में अधिक भीड़ हो जाती है,अतः यहां लगे तम्बुओं में ही ठहरना पड़ता है। शेषनाग झील के निर्मल जल में स्नान करके रास्ते की सारी थकावट दूर हो जाती हैं। यहां स्नान करने से गंगा स्नान के सामान ही फल प्राप्त होता हैं। झील के किनारे बावजन का मैदान रहने के लिये सुन्दर स्थान है,शेषनाग झील का सौन्दर्य अनुपम है। यहां पर मौसम काफी खराब रहता है और ठण्ड भी अपेक्षा से ज्यादा रहती है। श्री अमरनाथ यात्र पर जाने वाले लगभग सभी तीर्थयात्री रात्रि में इसी स्थान पर विश्राम करते हैं। प्रातःकाल उठकर शेषनाग झील में स्नान करने के पश्चात ही आगे की तीर्थयात्र प्रारम्भ करते है। इस झील से सम्बंध में एक अन्य कथा भी है जिसका उल्लेख आगे कथा में करेंगे।

सर्वप्रथम मुस्लिम गडरिया को दर्शन हुये थे पवित्र गुफा के
पवित्र पावन गुफा की खोज के सम्बंध में बताया जाता है कि एक बार एक मुस्लिम गड़रिया, जिसका नाम बूटा मलिक था और जो बहुत दयालु और नेक इंसान था। एक दिन बूटा मलिक अपनी भेड़ों को चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जगह पर पहुॅच कर बूटा मलिक की एक साधु के साथ भेंट हो गई। साधु ने बूटा मलिक को कोयले से भरी हुई कॉगड़ी दी। घर पहुंच कर बूटा मलिक ने कोयले से भरी कॉगड़ी को देखा तो उसमें कोयले के स्थान पर सोना पाया। बूटा मलिक हैरान हो गया। वह उसी समय साधु का धन्यवाद करने के लिए लौट पड़ा। परन्तु उस जगह साधु को वहां न पाकर एक गुफा को देखा। बूटा मलिक गुफा में गया तो उसे साक्षात हिम के लिंग के रूप में भगवान शिव के दर्शन हुये। उसने इसकी चर्चा अन्य लोगों से की और वह नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा अर्चना करने लगा। वहीं शिवलिंग के दर्शनार्थ श्रद्धालुओं की भीड़ एकत्र होने लगी और यह पवित्र स्थान एक तीर्थ बन गया। उस दिन से जो भी इस पवित्र गुफा में दान आता हैं उसका आधा हिस्सा बूटा मलिक के परिवार को दिया जाने लगा। बाकी हिस्सा तीर्थ स्थान को चलाने वाले ले जाते थे। लेकिन कुछ वर्षो पूर्व इस पवित्र गुफा की व्यवस्थाओं के लिये श्राइन बोर्ड का गठन किया गया। जिसमें बूटा मलिक के परिवार का एक सदस्य, जम्मू -कश्मीर सरकार तथा प्रशासनिक लोगों को शामिल किया गया और बूटा मलिक के परिवारिक सदस्यों को रायल्टी के रूप धनराशि दे दी गयी। वर्तमान में इस पवित्र गुफा की सभी जिम्मेदारी श्राइन बोर्ड के पास है। जो श्री अमरनाथ गुफा की सभी व्यवस्थाओं के लिये जिम्मेदार है। श्राइन बोर्ड के अधीन ही श्री अमरनाथ गुफा में पूजा अर्चना की जाती है। गुफा के आस-पास लगने वाली प्रसाद की दुकानों पर भी श्राइन बोर्ड का नियंत्रण रहता है और दुकाने लगाने के लिये बकायदा उनसे शुल्क लिया जाता है। यहां तक कि श्राइन बोर्ड की पूर्व अनुमति से ही वहां पर तम्बू लगायें जा सकते है।

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