February 12, 2026

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कोश्यारी की चिट्ठी में छलका जनता के लिए दर्द

देहरादून । सूबे में प्रचंड बहुमत की भाजपा नीत त्रिवेंद्र सरकार के फैसलों के खिलाफ आये दिन नैनीताल हाईकोर्ट के आदेशों को लेकर भाजपा के सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने न सिर्फ निजी रूप से सवाल उठा दिये हैं बल्कि उन्होंने केंद्रीय कानून मंत्री से मिलकर उत्तराखंड हाईकोर्ट के कई फैसलों को लेकर चिंता व्यक्त कर दी है। पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा के विदाई भाषण और कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह के बयानों के बहाने सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने लगातार सत्ता पक्ष के खिलाफ बन रहे माहौल को भांपते हुए हाईकोर्ट के आदेशों से जूझ रहे प्रदेशवासियों को बचाने की ढाल बना ली है। नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा क्षेत्र से सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को पत्र सौंप कर कहा कि वह हाईकोर्ट की अतिसक्रियता से प्रदेश शासन व जनता को राहत देने की कृपा करें। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अपने विदाई भाषण में कहा था कि न्याय का मानवीय चेहरा होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश का कहना था कि गरीब और अमीर सबके आंसू समान होते हैं। कोश्यारी ने पत्र में इसका जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि क्या लोगों का रोजगार खत्म कर देना, हजारों लोगों को बेघर कर देना मानवीय चेहरा है। अपने पत्र में कोश्यारी ने कहा है कि पिछले दिनों उत्तराखंड के समाचार पत्रें में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह का एक बयान आया कि उत्तराखंड में प्रदेश सरकार की जगह न्यायपालिका शासन चला रही है। एक जिम्मेदार राजनेता के बयान के बाद इस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी हो गया है। कोश्यारी ने अपना दर्द बयां करते हुए पत्र में कहा कि नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा रोजाना एक न एक जनहित याचिका पर फैसला आ जाता है। ऐसा लगता है कि ये पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन न होकर पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन हो गई हैं। नैनीताल और कुमाऊं क्षेत्र के लोग अब न्यायालय को न्याय के मंदिर की जगह अपने लिए आफत समझने लगे हैं। सौ-पचास साल से चल रहे होटलों को आदेश हो जाता है कि पार्किग व्यवस्था न हो तो वे होटल के आधे कमरे खाली रखें। होम स्टे पर भी स्टे यानि पाबंदी का आदेश हो जाता है। प्रदेश में रिवर राफ्रिटंग व साहसिक पर्यटन पर पाबंदी लग जाती है। कोश्यारी के मुताबिक इन आदेशों से प्रदेश के पर्यटन व विकास पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। हाल में सरकारी भूमि पर पिछले 30-40 साल से निवास कर रहे घरों को नेस्तनाबूद करने का आदेश दे दिया गया। जनता की मांग पर जनप्रतिनिधियों के प्रयास से रेलवे ने सुबह काठगोदाम से देहरादून और दोपहर बाद देहरादून से काठगोदाम ट्रेन शुरू की। अभी गाड़ी को चले तीन दिन ही हुए थे कि कोर्ट का आदेश हो गया कि रेल सुबह काठगोदाम से नहीं देहरादून से चले। हो सकता है कानूनी नजरिए से यह सही हो मगर जब सरकार रोजगार देने और हर परिवार को घर देने का संकल्प ले रही हो तो क्या हजारों घरों को एक साथ ध्वस्त करने का आदेश सही ठहराया जा सकता है। कुल मिलाकर कोश्यारी के पत्र में न सिर्फ उनका बल्कि हजारों लोगों का दर्द झलक रहा है। कोश्यारी की इस चिट्ठी का असर आगे क्या होगा, इसे लेकर राजनैतिक गलियारों में भी चर्चाएं हैं।

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