January 22, 2026

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उत्तरकाशी की आपदा: “बादल फटने से नहीं बल्कि बरसों से दबे खतरे के फूटने से हुई त्रासदी”

धराली (उत्तरकाशी)। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जनपद के धराली गांव में 5 अगस्त को आई विनाशकारी आपदा के पीछे का कारण केवल बादल फटना नहीं, बल्कि वर्षों से जमा हुआ एक अदृश्य और अनदेखा भू-संरचनात्मक खतरा था। यह दावा प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक और Punatsangchhu‑I परियोजना (भूटान) के भू-विभाग प्रमुख डॉ. इमरान खान ने किया है। डॉ. खान के अनुसार, यह घटना एक सामान्य क्लाउडबर्स्ट नहीं थी, बल्कि धराली से करीब 7 किमी ऊंचे ग्लेशियर क्षेत्र में स्थित एक विशाल ग्लेशियरिक जमा (glacial deposit) के टूटकर ढहने से हुई।

उन्होंने कहा कि यहां लगभग 360 मिलियन घन मीटर मलबा जमा था, जो 1.4 लाख ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल के बराबर माना जा सकता है। इस जमा में वर्षों से अस्थिरता बनी हुई थी, और तेज बारिश ने उसे बस एक ट्रिगर प्रदान किया।डॉ. खान ने इस पूरे क्षेत्र को “Disaster Waiting to Happen” बताया है और कहा कि धराली जैसे इलाकों में इस तरह के छिपे खतरे पहले से मौजूद हैं, लेकिन पर्यावरणीय मूल्यांकन और निर्माण नीतियों में उन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना केदारनाथ की 2013 की आपदा से भी अधिक विश्लेषण की मांग करती है, क्योंकि यह केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि “चेतावनियों की उपेक्षा और विकास के दबाव का परिणाम” थी। स्थानीय स्तर पर कई भूवैज्ञानिक वर्षों से इस क्षेत्र को “भूस्खलन संभावित क्षेत्र” घोषित करने की मांग कर रहे थे।

लेकिन पर्यटन विकास, निर्माण कार्यों और जलवायु परिवर्तन के प्रति असंवेदनशील दृष्टिकोण ने इन चेतावनियों को दरकिनार कर दिया।अब जब धराली गांव में कई मकान बह गए हैं, खेत और दुकानें मलबे में तब्दील हो गई हैं और लोगों की ज़िंदगियाँ उजड़ गई हैं, तब सवाल यह उठ रहा है – क्या यह आपदा रोकी जा सकती थी? यानी  यह सिर्फ एक त्रासदी नहीं थी, यह एक अनदेखा सत्य था जो आखिरकार ज़मीन पर फट पड़ा।

#इमेज सोर्स जियोलॉजिस्ट इमरान खान

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