February 25, 2026

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उत्तराखंड में सरकार अभी तक नहीं करवा सकी नगर निकायों का चुनाव : अब त्रिस्तरीय पंचायतों में भी प्रशासक बैठने की तैयारी

एक दिसंबर को समाप्त हो रहा जिला पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल
देहरादून। मदर ऑफ डेमोक्रेसी के रूप में सारी दुनिया में प्रतिष्ठित हो चुके भारत के एक राज्य उत्तराखंड में निचले स्तर पर लोकतंत्र के प्रभावहीन करने का सिलसिला बदस्तूर जारी है ।बताने की जरूरत नहीं की समूचे विश्व में भारत की प्रतिष्ठा मदर ऑफ डेमोक्रेसी के रूप में केवल और केवल इसलिए है ,क्योंकि भारत में केंद्र सरकार से लेकर ग्राम पंचायत तक को गठित एवं संचालित करने के लिए एक विशुद्ध लोकतांत्रिक प्रक्रिया संविधान के अंतर्गत विहत की गई है। इस विशुद्ध लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत के जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि ही सरकार की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत से लेकर सबसे बड़ी इकाई केंद्र सरकार तक का संचालन करते हैं। भारत का कोई भी नागरिक निर्धारित चुनाव प्रक्रिया में शामिल होकर जनप्रतिनिधि निर्वाचित हो सकता है। वैसे तो भारत में शासन एवं व्यवस्था संचालन की किसी भी लोकतांत्रिक इकाई का कार्यकाल 5 साल नियत है और 5 साल बाद नए जनप्रतिनिधियों की नियुक्ति के लिए नया निर्वाचन कराए जाने की व्यवस्था है ,लेकिन कई बार विभिन्न राजनीतिक एवं सरकारी हितों के चलते जनता द्वारा चुनी गई शासन संचालन की इकाई अथवा जनप्रतिनिधि, समय से पूर्व पदमुक्त कर दिए जाते हैं या फिर किसी स्वार्थ विशेष के कारण 5 वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नए जनप्रतिनिधियों के निर्वाचन की प्रक्रिया जानबूझकर नहीं आरंभ की जाती। दूसरे शब्दों में कहें तो शासकीय सेवक की तरह लोकतंत्र को भी सरकार अथवा नौकरशाहों द्वारा लंबी छुट्टी पर भेज दिया जाता है और शासन अथवा व्यवस्था संचालन पर कब्जा कर लिया जाता है। उत्तराखंड में लोकतंत्र को लंबी छुट्टी पर भेजना शुरुआत पिछले वर्ष दिसंबर माह में हुई थी, जब नगर निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रदेश के सभी नगर निकायों में प्रशासक की नियुक्ति कर दी गई थी। मजे की बात तो यह है कि तकरीबन 11 महीने की लंबी अवधि व्यतीत हो जाने के बाद भी उत्तराखंड सरकार अभी तक नगर निकायों का चुनाव नहीं करवा सकी। यह स्थिति तब है, जबकि उत्तराखंड सरकार नैनीताल उच्च न्यायालय में 10 नवंबर को स्थानीय निकायों के निर्वाचन की अधिसूचना जारी करने संबंधी शपथ पत्र पेश कर चुकी है। राज्य के नगर निकायों में लोकतंत्र को लंबी छुट्टी में भेजने के बाद अब ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत में भी लोकतंत्र को लंबी छुट्टी पर भेजे जाने के पूरे आसार हैं। वह इसलिए, क्योंकि उत्तराखंड सरकार की नए त्रिस्तरीय पंचायतों प्रतिनिधि निर्वाचित कराई जाने की फिलहाल कोई भी तैयारी नहीं है ।ऐसी स्थिति में 27 नवंबर को ग्राम पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने तथा 29 नवंबर को क्षेत्र पंचायत प्रमुखों का कार्यकाल समाप्त होने तथा 1 दिसंबर को जिला पंचायत प्रमुखों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद त्रिस्तरीय पंचायतों की व्यवस्था संचालन की बागडोर प्रशासकों के हाथ में देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है । ज्ञात हो कि उत्तराखंड में प्रदेश में 7823 ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि, 3157 क्षेत्र पंचायत प्रतिनिधि और 387 जिला पंचायत प्रतिनिधि पंचायत चुनाव के माध्यम से चुने जाते हैं, लेकिन इतनी लंबी चुनावी प्रक्रिया को संपन्न कराने कोई सरकारी तैयारी फिलहाल दूर दराज तक नजर नहीं आ रही। लिहाजा 1 दिसंबर को सूबे में त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ,उनमें प्रशासक बैठाकर लोकतंत्र को लंबी छुट्टी पर भेजा जाना लगभग तय है। लोकतंत्र की यह छुट्टी कितनी लंबी होगी? यह कह पाना फिलहाल काफी मुश्किल है।

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